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आप भी पागल हैं।

पागल होना बड़ा कठिन हैहां! सही सुना आपने,ये आसान नहीं है किबस सुनना अपनी,और अपने मन की ही करते जाना।अपने में ही खुश रहना,और किसी को खुश न कर पाना ये आसान नहीं है कि चांदनी रातों में तारे ताकते...

रूटीन (अंतिम भाग)

मैने जल्दी से फोन की टॉर्च जलाई , फिर खिड़की का पर्दा हटाया। बाहर से कुछ रोशनी आनी शुरू हुई। फोन की टॉर्च बंद की, तभी बाहर से बहुत ही तेज बिजली चमकी और पूरा कमरा रोशनी से नहा गया। अभी तो फिलहाल मुझे...

लखनऊ मेट्रो

‘आज तो ऑफिस के लिए लेट हो जाऊंगा’कहते हुए मैं मुंशीपुलिया मेट्रो स्टेशन के बाहर बनी एस्केलेटर की सीढ़ियों पर तेजी से चढ़ने लगा। चूंकि मैं लेट हो रहा था और ऊपर से यह लखनऊ मेट्रो- जो लेट होने पर जैसे...

नन्हा गुंडा

एक साधारण सा दिन था। घर के अंदर, बिस्तर पर लेटा हुआ कुंज अपनी दुनिया में मस्त था। कुंज की उम्र ढाई महीने थी। उसकी जिंदगी में सिर्फ तीन काम थे। दूध पीना। सोना। और बिना वजह मुस्कुराना। कभी पंखे को देखकर...

उधार की लिट्टी

एक छोटे कस्बे में, शाम ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए थे। गली के मोड़ पर एक छोटी सी लिट्टी-चोखा की दुकान धुएँ और घी की खुशबू से महक रही थी। दुकानदार (लिट्टी सेंकते हुए)गरमा-गरम लिट्टी आओ भइया, खा लो!...

चूहा

ताला बंद हो चुका था। ऊषा आंटी ने धीरे से अपनी कमर को घुमाया, ‘घर्र-घर्र-कट’ की आवाज जोर से आई, आवाज को सुन सभी सजग हो गए, पर फिर उन्हें ध्यान आया, ये तो ऊषा आंटी के एक्सरसाइज़ करने का समय है! अंकल सैम...

भूख

कल भी कुछ खाने को नसीब नहीं हुआ था, और आज? आज भी दोपहर आधी से ज्यादा बीत चुकी थी, पर कुछ भी नहीं मिला था। और ये दोपहर! ये कोई ऐसी-वैसी दोपहर नहीं थी। जून महीने की लू से भरी हुई दोपहर!    तेज धूप की...

रूटीन (भाग -2) अमन की कलम

लेकिन जैसा कि कॉर्पोरेट में काम करते-करते सीख चुके हैं कि आपदा भी एक अवसर होता है तो सोचा कि जिसकी चाह में मीलों सफर करके जाने का सोच रहे थे जब वो मौसम खुद दर्शन देने दरवाज़े पर आया है तो वाजिब नहीं...

मक़ाम-ए-ज़फ़र

जुल्फ़ें सर्द हो चलीं अब तक हमसफ़र न मिला कोई मिला भी तो दो वक़्त मुसलसल न मिला ये असर है तेरी रहनुमाई का आलिम बग़ीचा जो दिखा था दूर से वहाँ एक उजड़ा शजर न मिला पूरी उम्र बिता दी चलते हुए रहगुज़र समझ...