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मक़ाम-ए-ज़फ़र

जुल्फ़ें सर्द हो चलीं अब तक हमसफ़र न मिला

कोई मिला भी तो दो वक़्त मुसलसल न मिला

ये असर है तेरी रहनुमाई का आलिम

बग़ीचा जो दिखा था दूर से वहाँ एक उजड़ा शजर न मिला

पूरी उम्र बिता दी चलते हुए रहगुज़र समझ कर

शायद मंज़िल मिली पर मक़ाम-ए-ज़फ़र न मिला

Aman

दिन के उजाले में एक आम जॉब की ज़िम्मेदारियाँ और शाम ढलते ही शब्दों की जादुई दुनिया—यही अमन की पहचान है। हिंदी और उर्दू शायरी के प्रति उनका जुनून उन्हें रोज कुछ नया लिखने की प्रेरणा देता है। वे अपनी कलम से जिंदगी, मोहब्बत और इंसानी एहसासों को बेहद सादगी से पन्नों पर उतारते हैं।

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