Recent Posts
जब हफ्ते की भागदौड़मिलती है रविवार सेआता है समझकी जीवन क्या हैसिर्फ भागना दौड़ना नहींठहरकर देखना भी हैपर ये ठहराव नहीं हैबस एक पड़ाव है जीवन काक्योंकि रविवार भी जानता हैआगे फिर पूरा हफ्ता हैऔर ये...
अगला दिन क्योंकि रविवार था तो मैं सुबह से ही फिल्म फेस्टिवल में था। सुबह 9:00 बजे से स्क्रीनिंग की शुरुआत होनी थी पर मैं 8:45 पर ही वहां पहुंच चुका था। पहुंचने पर देखा कि कई स्कूल के बच्चे भी वहां आ...
फिल्मों के ही सपने देखते-देखते अगले दिन आंख खुली। उस दिन तो सुबह से ही फिल्म दिखाई जानी थी, पर ऑफिस होने के कारण शाम को ही जा सका। उस दिन की पहली मूवी जो मैने देखी वह थी “एट लास्ट वी सेड गुड बाय”...
पिछले रविवार की सुबह साइकिल पर सैर करते हुए मन हुआ कि आज किसी नए रास्ते का रुख किया जाए, तो चलाते-चलाते साइकिल दूसरी तरफ मोड़ ली। रास्ता अनजान था, पर शहर तो अपना ही था और ये तो कहा ही जाता है कि...
“हट! हट यहाँ से!” “ पता नहीं कहाँ-कहाँ से चले आते हैं? खुद तो गंदी हो और मुझे भी गंदी किए जा रही हो। कभी आईने में अपनी शक्ल देखी है? और कभी मेरे जैसी रंगत और चमक देखी है? नहीं ना?” “वैसे तो मैं यहाँ...
जून की लू के थपेड़ों से भरी हुई दोपहर, सीमेंट की चादर से बनी छत की दरार से आती हुई धूप, मनोज के चेहरे पर पड़ती हुई उसकी नीद में खलल डाल रही थी। बीच-बीच में सफेद बादल आकर उसकी तीव्रता को कम जरूर कर...
“पहला” शब्द कितना मनमोहक होता है, जिसके आगे लगता है उसके महत्व को और भी बढ़ा देता है, अब चाहे वह पहला काम हो, पहली कार हो,पहला घर हो या कुछ और। यहां बात है लोकसभा इलेक्शन में मेरी पहली ड्यूटी...
शुरुआत का समय, सोचा लिखना चाहिए, विचार तो बहुत मन में आते है पर क्या-क्या पता नहीं । बड़े अजीबो- गरीब, स्वप्न भी कहानी या चलचित्र के समान प्रतीत होते। आनंद तो बड़ा आता है पर क्या ये सभी लिखने योग्य...
गुब गुब गुब गुब्बारेदेखो देखो है ये कितने सारेगुब गुब गुब गुब्बारेदेखो देखो है ये कितने सारे कुछ कुछ कुछ नीचे पड़े हैंकुछ कुछ कुछ ऊंचे उड़ चले हैसंग संग चलते ये हमारेगुब गुब गुब गुब्बारेदेखो देखो है...
