बारिश (भाग -2) अमन की कलम

लेकिन जैसा कि कॉर्पोरेट में काम करते-करते सीख चुके हैं कि आपदा भी एक अवसर होता है तो सोचा कि जिसकी चाह में मीलों सफर करके जाने का सोच रहे…

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मक़ाम-ए-ज़फ़र

जुल्फ़ें सर्द हो चलीं अब तक हमसफ़र न मिला कोई मिला भी तो दो वक़्त मुसलसल न मिला ये असर है तेरी रहनुमाई का आलिम बग़ीचा जो दिखा था दूर…

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