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चप्पल सुंदरी



हट! हट यहाँ से!
पता नहीं कहाँ-कहाँ से चले आते हैं। खुद तो गंदी हो और मुझे भी गंदी किए जा रही हो। कभी आईने में अपनी शक्ल देखी है? कभी ऐसी रंगत और चमक देखी है?

वैसे तो मैं यहाँ आती ही नहीं, पर न जाने क्यों आज मुझे यहाँ खींच लाया गया है। और मैं अकेली भी नहीं हूँ—वो देखो! उसे सिर्फ़ मेरा ख्याल रखने के लिए ही लाया गया है।
अरी! अपनी तरफ़ भी तो देखो। लगता है जैसे कभी साफ पानी छुआ ही नहीं।

मुझे देखो—कितने जतन से रखा जाता है मुझे। ज़रा-सा भी गीली हो जाऊँ तो गरम-गरम ब्लोवर से सुखाया जाता है।
सुना है कभी ब्लोवर का नाम? नहीं ना।
और ये चमक! ऐसे ही थोड़ी आ गई है। इस पर रोज़ कितनी महँगी-महँगी क्रीम लगती है। सारी चप्पल बिरादरी में लोग मुझे चप्पल सुंदरी कहकर बुलाते हैं।

मेरा घर देखोगी तो दंग रह जाओगी—इतना साफ, इतना सुंदर कि चेहरा देखने के लिए शीशे की भी ज़रूरत न पड़े। मेरा बिस्तर तो इतना मुलायम है कि उसमें धँस जाती हूँ।
घर पहुँचते ही सीधे अंदर, फिर अपने बिस्तर पर। कहीं आना-जाना नहीं—बस घर से दफ़्तर और दफ़्तर से घर। और दफ़्तर तो ऐसा कि वहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता। उसे भी अंदर आने से पहले पास दिखाना पड़ता है। चप्पे चप्पे पर पुलिस लगी रहती है, एक चीज भी इधर की उधर नहीं हो सकती है।

दूसरी चप्पल (थकी-हारी आवाज़ में)
बहन! मैं क्या करूँ? तुम तो कम से कम एक ही मालिक के साथ रहती हो। पर मैं? मैं तो हर बार नए-नए पैरों में पड़कर तंग आ चुकी हूँ।
मंदिर के सामने वो जो दुकान दिख रही है, वही मेरा अंतिम ठिकाना है। जिस दिन मंदिर आती हूँ, उसी दिन वहाँ जाना तय है।

और मालिक तो ऐसे-ऐसे मिले कि क्या बताऊँ। एक के घर में तो उसके बच्चे ने मुझे इतनी ज़ोर से काटा कि आज तक निशान पड़ा हुआ है  और कितनी कहानियाँ सुनाऊँ?

चप्पल सुंदरी (ऊबकर)
बस-बस! अपनी रामकहानी रहने दो। मैं चली। मेरे मालिक आ गए हैं।

दूसरी चप्पल (आह भरते हुए)
मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है? काश! मैं भी किसी ऐसे मालिक के पास होती जो मुझे जतन से रखता।
पर इसमें मालिक की क्या गलती? मैं हूँ ही ऐसी। अगर मैं भी अच्छे क्वालिटी की बनी होती तो शायद मेरी किस्मत भी बदल जाती।

(अचानक कोई उसे पहनने की कोशिश करता है)
अरे! अरे! तुम कहाँ आ रहे हो? मैं तुम्हारी नहीं हूँ। हटो मेरे ऊपर से! मेरा मालिक आता ही होगा।
हटो! हटो! ओफ़्फ़ो! कितनी बदबू है। मुझे तो चक्कर आ रहे हैं। आँखों के आगे अँधेरा-सा छा रहा है…

(होश आता है)
मैं कहाँ हूँ? सिर भारी लग रहा है…
ये क्या! ये तो वही दुकान है।
लगता है मैं फिर से चोरी हो गई हूँ और इसी दुकान पर लौट आई हूँ। मेरी किस्मत ही ऐसी है—जब भी कोई अच्छा मालिक मिलता है, मैं चोरी हो जाती हूँ।
और अब देखो, इस गंदी-सी जगह पर एकदम किनारे पटक दिया गया है। ज़रा-सा झटका लगा तो गिर जाऊँगी।

अरे-अरे! ध्यान से… अरे! मैं तो गिर ही गई…

(दूसरी चप्पल चकित होकर)

अरे! चप्पल सुंदरी!
तुम यहाँ?

(ये कहानी एक वास्तविक घटना पर आधारित है जहां एक बहुत ही महंगी चप्पल, एक बहुत ही सुरक्षित माने जाने वाले ऑफिस के योगा रूम के बाहर से गायब हो जाती है)

This Post Has 2 Comments

  1. Noopur Gupta

    Bahut sundar

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