“इतनी जल्दी सुबह कैसे हो गई आज?” मैने आंख मलते हुए अपनी पत्नी से पूछा।
“सुबह कहां? अभी तो चार ही बज रहा है” पत्नी ने घड़ी देखते हुए कहा
“फिर ये इतना शोर शराबा क्यों हो रहा है बाहर” मैने कहा
“अब मुझे क्या पता, जा कर देखो न”
इतनी सुबह सुबह ऐसा शोर शराबा तो नहीं होता था। बाहर निकल कर देखा तो पता चला कि हमारे ऊपर वाले फ्लैट पर लोग जा रहे थे। शायद कोई भगवान को प्यारा हो गया था। पड़ोसी होते हुए भी उनसे जान पहचान नहीं थी, पर पड़ोसी का फर्ज तो निभाना ही था सो कुछ समय बाद मैं और मेरी पत्नी नहा-धो व स्वेत वस्त्र धारण कर उनके फ्लैट की तरफ चल दिए। वहां भीड़ कुछ खास नही थी और क्योंकि गुजरने वाले का चेहरा ढाका हुआ था तो हमने अंदाजा लगाया की ये जरूर वही बुजुर्ग होंगे जो रोज हमारे घर के सामने से खांसते हुए जाते थे। उनके खांसने से ही हमारी नींद खुलती थी। पहले जब हम लोग वहां पहुंचे थे तो थोड़े ही दुखी थे पर जैसे ही हमे लगा कि ये वही बजुर्ग है तो हम दोनों लोग थोड़े ज्यादा दुखी हो गए। दुख बढ़ने का कारण उनका जाना नहीं था बल्कि इसकी वजह ये थी कि उनके चले जाने से हमारा अलार्म क्लॉक भी चला गया था, आखिर उन्हीं के खांसने से तो हम लोग सुबह उठ पाते थे।मन ही मन उनको श्रद्धांजलि देकर हम लोग अपने घर आ गए।
घर आ कर सबसे पहला काम हमने फोन में अलार्म सेट करने का किया, क्योंकि सुबह लेट उठने का मतलब था कि पूरा दिन खराब हो जाना। रात में हम इसी डर के साथ सोए कि कल हमारी सुबह कहीं दोपहर को न हो। पर देर से जागने के डर ने नहीं बल्कि एक अलग ही डर और विस्मय ने हमारी आंखे खोली। वही खांसी की आवाज हमारे कानों में प्रवेश करके हमारे मस्तिष्क और शरीर में सिहरन पैदा कर गई। डर और आश्चर्य से भरते हुए मैंने दरवाजे के होल से बाहर देखा तो लगभग मेरी चीख निकलते-निकलते रह गई। वो वही बुजुर्ग थे जिनके आत्मा- पलायन समारोह में हम कल होकर आए थे, पर वो तो एकदम जीवित लग रहे थे। विस्मय, डर, और विभिन्न प्रकार की भावनाओं के बीच मेरे मन में एक ही बात चल रही थी कि तो फिर “वो कौन था”।

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