मुनिवर, कुछ रास्ता निकालिए। बेचारे कितनी प्रार्थना करते हैं। आप तो महर्षि हैं। आप की तो तीनों देवताओं से ट्यूनिंग भी अच्छी है। कोई तो उपाय करिए।
आप लोग चिंता न करें, ये डिपार्टमेंट तो वैसे भगवान विष्णु का है चलिए उन्हीं के पास ही चलते हैं।
नारायण! नारायण!, हे कृपा सिन्धु!, आंखे खोलिए और देखिए आपके विभिन्न अवतारों की जन्मभूमि,भारतवर्ष की दुर्दशा। लोग बढ़ते ही जा रहे हैं पर रहने को घर की सुविधा नहीं है। आप तो सम्पूर्ण जगत के पालनहार हैं, कुछ उपाय कीजिए।
महर्षि नारद कृपया विस्तार से और उदाहरण सहित बताइए।
अच्छा तो प्रभु उदाहरण सहित सुनिए।
वाराणसी शहर के घनी आबादी वाले इलाके में रहने वाला राजेश एक ऑटो चालक है रोज सुबह 5:00 बजे घर से निकलकर देर रात लौटता है, दिन भर की कमाई से वह परिवार का पेट तो पाल लेता है पर उसके घर की हालत शोचनीय है। एक तंग सी गली वाले घर में छत से टपकता पानी, चारपाई पर सोते हुए बच्चे और दीवारों पर नमी। बारिश के दिनों में हालात और भी बत्तर हो जाते हैं, घर कीचड़ से भर जाता और बच्चे बीमार पड़ जाते हैं। राजेश अक्सर कहता है- “कमाने के बाद भी अगर अपने परिवार को सुरक्षित छत ना दे पाऊं तो मेहनत का क्या अर्थ ?”
यह कहानी केवल राजेश कि नहीं है प्रभु, बल्कि, भारत के करोड़ों परिवारों की हकीकत है। एक अकड़े के अनुसार भारत में लगभग 2 करोड़ से अधिक परिवारों के पास पक्के घर नहीं हैं और लाखों लोग झुग्गियों, असुरक्षित मकान या किराए के बोझ में जीवन काट रहे हैं। स्वतंत्रता के 78 वर्ष बाद भी “हर किसी की सर पर छत” का सपना अधूरा है।
प्रभु, रोटी कपड़ा और मकान किसी भी व्यक्ति की जरूरी आवश्यकताओं में से एक होता है और जब यही आवश्यकताएं एक समस्या बन जाती हैं तो उसे सुधारना बहुत जरूरी होता है। क्षेत्रफल की दृष्टि से सातवें पायदान पर होने के बावजूद बेंगलुरु और गुरुग्राम जैसे शहरों में जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं और भूमि की कमी हो गई है, वहीं यूपी और बिहार जैसे राज्यों में जहां भूमि बहुतायत में उपलब्ध है वहां भी भूमि विवाद के कारण आवास की समस्या कायम रहती है। वहीं 2024 में दिल्ली नगर निगम रिपोर्ट के अनुसार 55,000 से अधिक लोग सड़कों पर सोते हैं। प्रवासी मजदूरों की हालत तो आप जानते ही है, कोविड- 19 में उनकी स्थिति किसी से छुपी नहीं, हीटवेव के दौरान सबसे अधिक प्रभावित वही मजदूर होते है जिनके पास स्थायी घर नहीं हैं। बड़े शहर तो छोड़िए ये छोटे शहरों में मकान मालिक किराएदारों की पहचान (जैसे अविवाहित, प्रवासी) के आधार पर भेदभाव करते हैं। किरायेदारी कानूनों की जटिलता के कारण मकान मालिक किराए पर घर देने से हिचकते हैं। शहरों में झुग्गियों में बुनियादी सुविधाएं जैसे शौचालय, पानी और बिजली तक की कमी है इसका उदाहरण एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी धारावी, मुंबई है और जो कुछ पक्के आवास है वे ऊर्जा दक्षता की कमी से जूझ रहे है– अधिकतर घरों में बिजली की खपत ज्यादा है और प्राकृतिक वेंटिलेशन कम है। वहीं जहाँ रोज़गार उपलब्ध है, वहाँ सस्ता आवास नहीं, और जहाँ सस्ते घर हैं वहाँ रोज़गार के अवसर कम। एक- एक अमीर ऐसे हैं जिनको अपने ही घर में आने जाने के लिए ही वाहन और लिफ्ट का सहारा लेना पड़ता है, वहीं ऐसा भी है जहां छोटे से कमरे में ही कई लोग रहने को मजबूर हैं।
नारद मुनि, बढ़ती कीमतों को हम गृह ऋण सब्सिडी के माध्यम से, प्रधानमन्त्री आवास योजना और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कमी करके संभालने में प्रयासरत हूं। यू.पी., बिहार जैसे राज्यों में स्वामित्व योजना से भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण करना और ब्लॉकचेन जैसे नई तकनीकों से उन अभिलेखों को सुरक्षित करने का प्रयास है, जैसाकि आंध्र प्रदेश में किया भी गया है। सड़क पर सोने वाली के लिए हमने रैन बसेरे और नाइट सेल्टर जैसी सुविधाएं प्रदान की हैं। प्रवासी मजदूर के लिए हमने श्रम मंत्रालय से कह कर प्रवासी आवास योजना शुरू कराई है साथ ही पीपीपी मॉडल के तहत किफायती आवास योजना भी शुरू की है। किराए के मकान की समस्या के लिए मॉडल टेनेंसी एक्ट और अधिकरण की व्यवस्था कराई है। झुग्गियों के लिए धारावी पुनर्विकास योजना का मॉडल की शुरुआत। ग्रीन बिल्डिंग प्रमोशन और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट से आवासों की ऊर्जा दक्षता को बेहतर बनाया जा रहा है। रही बात आवास और रोजगार की तो स्मार्ट सिटी और औद्योगिक गलियारे के साथ आवास की योजना पर भी काम चल रहा है। टैक्स और सब्सिडी के माध्यम से असमानता को भी दूर करने का प्रयास है।
प्रभु, आपकी योजनाएं तो बड़ी अच्छी हैं, पर इनका क्रियान्वयन बड़ा धीमा और अव्यवस्थित है, कृपया वहां भी ध्यान दीजियेगा।
नारदमुनि असल में ये समस्या काफी जटिल है और अगर गौर से देखें तो ये पूरा मामला हमारे डिपार्टमेंट का है भी नहीं। हम तो पालनहार जो है जहां हैं उसी में उसका पालन करते हैं। इन समस्याओं के हल के लिए तो कई चीजें हटानी भी पड़ेंगी, उसके लिए आपको भगवान शंकर के पास जाना चाहिए और वो तो वही विराजमान भी रहते हैं।
जैसी आज्ञा प्रभु।
त्राहि माम! त्राहि माम!, प्रभु रक्षा कीजिए
कहिए महर्षि नारद, कैसे आना हुआ?
प्रभु आप तो अंतर्यामी हैं आप से क्या छुपा है।
समस्या बताइए नारद ऋषि।
भगवान नारायण ने कंप्लायंस का ज़िम्मा तो ले लिया है, पर विध्वंस का काम तो आपको ही करना होगा।
विस्तार से बताए ऋषिपुत्र
प्रभु, दिल्ली में 1700 से अधिक अनाधिकृत कॉलोनियाँ अभी भी नियमितीकरण की प्रतीक्षा में हैं। भूकंप/बाढ़-प्रवण क्षेत्र में मकान असुरक्षित हैं, जोशीमठ में धँसते मकान इसका उदाहरण भी हैं। जलवायु परिवर्तन के असर से ओडिशा, असम, बिहार आदि राज्यो में बाढ़ से हर साल लाखों घर ढह जाते हैं। अनियमित और प्रचंड तूफान की आवृति भी बढ़ गई है जो आवासो को भरी नुकसान पहुंचाते हैं।
नारद ऋषि, अनाधिकृत कालोनियों को नष्ट करना अब संभव नहीं पर उनको मूलभूत सेवाएं प्रदान करके धीरे- धीरे वैध करना सही रहेगा और साथ ही आगे ये ध्यान भी दिया जा रहा है कि ऐसी कोई अनाधिकृति कॉलोनी न बसने पाए। भूकंप और बाढ़ तो प्राकृतिक आपदाएं है। भूकंप आदि से जापानी तकनीक जैसे “बेस आइसोलेशन सिस्टम” जैसी विधि का प्रयोग करके आवास निर्माण करके कुछ बचाव संभव है। बाढ़ को नदी जोड़ों परियोजना, सेटेलाइट निगरानी, सामुदायिक भागीदारी, जागरूकता आदि से प्रबंधित किया जा सकता है। और रही बात जलवायु परिवर्तन की तो उसे मनुष्यों ने खुद ही ला खड़ा किया है, फिर भी, उससे आने वाले तूफान से बचाव के लिए भारतीय तटों पर बंगलादेश के “साइक्लोन शेल्टर मॉडल” के आधार पर जलवायु रोधी आवास का निर्माण किया जा सकता है। वन आवरण बढ़ाना, शहरी वन को बढ़ावा देना, भवन निर्माण वातावरण अनुकूलित हो इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए।
हे नारद ऋषि! मेरा काम यहीं तक था, आगे के काम के लिए आपको परमपिता ब्रह्मा के पास जाना पड़ेगा क्योंकि नई चीजों का सृजन उन्हीं का डिपार्टमेंट है।
जो आज्ञा प्रभु।
परमपिता ब्रह्मा की जय हो।
प्रभु कंप्लायंस और डिस्ट्रक्शन का काम तो मैनेज हो गया है, पर इस विकट समस्या के लिए सृजन भी आवश्यक है कृपया दिशा दिखाइए।
पुत्र, समस्या बताओ।
प्रभु, शहरी झुग्गियों का विस्तार काफी बढ़ गया है मुंबई, दिल्ली, कोलकाता जैसे महानगरों में तो 40% से अधिक आबादी झुग्गियों में रहती है। 2023 की नाइट फ्रैंक रिपोर्ट के अनुसार शहरी भारत में किफायती आवास की भारी कमी है। जनसंख्या भी तेजी से बढ़ती जा रही है, अब भारत चीन को जनसंख्या में पीछे छोड़कर प्रथम स्थान पर आ गया है। अनुमान है कि 2030 तक भारत की शहरी आबादी 60 करोड़ पहुँच जाएगी। वहीं स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की प्रगति इतनी धीमी है कि 2024 तक 100 स्मार्ट शहरों में से 60% प्रोजेक्ट अधूरे हैं। मेट्रो और हाईवे प्रोजेक्ट्स के निर्माण के नाम पर झुग्गीवासियों का बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ है। आप जैसे वृद्धजन के लिए उपयुक्त आवास की कमी भी एक समस्या है। प्रभु उनके लिए “वरिष्ठ किफायती रिटायरमेंट” घर अभी सीमित हैं। अनियमित शहरीकरण भी एक समस्या है,उदाहरण के लिए गुड़गाँव में बिना प्लानिंग बने हजारों अपार्टमेंट्स जलभराव की समस्या झेलते हैं। शहर तो शहर, गाँवों में भी पक्के घरों की कमी है, ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार अभी भी लगभग 1.5 करोड़ ग्रामीण परिवार कच्चे घरों में रहते हैं।
और तो और प्रभु मकान निर्माण में भ्रष्टाचार के मामले भी सामने आते हैं, कई जगह प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभार्थियों से रिश्वत लिए जाने के मामले सामने आए हैं, साथ ही कई घरों में निर्माण की गुणवत्ता खराब पाई गई है। इन सब समस्याओं का हल प्रदान कीजिए प्रभु।
पुत्र, झुग्गियों में “धारावी पुनर्विकास योजना” जैसी योजनाएं चलाए जाने की जरूरत है साथ ही पाइप जल योजन और सामुदायिक शौचालयों का निर्माण भी बड़े पैमाने पर किया जाना चाहिए। किफायती आवास योजन और पीपीपी योजना से आवास निर्माण का कार्य जारी है। जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम और शहरी मास्टर प्लान से शहरी आबादी की समस्या को ठीक किया जा सकता है। स्मार्ट सिटी जैसे कार्यक्रम को समयसीमा और जवाबदेही तय करके व्यवस्थित किया जा सकता है और उसके निर्माण के विस्थापितों को अहमदाबाद के “स्लम नेटवर्क प्रोजेक्ट” जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सही किया जा सकता है। मेरे जैसे बुजुर्गों को आवास निर्माण में टैक्स छूट प्रदान करके उनकी समस्या हल करने का विचार है। अनियमित शहरीकरण को गांधीनगर और नवीमुंबई जैसी “सेटेलाइट टाउनशिप” योजना के तहत सुधार जा सकता है। “प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण” को गति प्रदान करके और धनराशि का सीधे लाभार्थियों के खाते में स्थानांतरण करने के साथ ही थर्ड पार्टी ऑडिट, स्थानीय सामग्री का प्रयोग और शिकायत निवारण पोर्टल की सुविधा दे कर गांव के कच्चे मकान की समस्या को हाल किया जा सकता है।
धन्यवाद प्रभु।
धन्यवाद नारद जी, आप थे तभी ये काम संपन्न हों पाया। एक तो ऐसी जटिल समस्या ऊपर से एक नहीं तीन-तीन डिपार्टमेंट!
भारत के लोगो के लिए आवास केवल चार दीवारें और छत नहीं, बल्कि गरिमा और सुरक्षा का प्रश्न है। अगर हर परिवार को पक्का, सुरक्षित और किफायती घर मिलेगा तो शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार में भी सुधार स्वतः होगा।
राजेश जैसे लाखों परिवार तभी चैन की नींद सो पाएँगे जब सरकार, निजी क्षेत्र और समाज मिलकर ठोस कदम उठाएँगे। भारत के पास तकनीक, संसाधन और इच्छाशक्ति तीनों हैं। ज़रूरत केवल नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन और मानवीय दृष्टिकोण की है।
एक भविष्य की कल्पना कीजिए जब हर नागरिक कह सके –
“मेरे पास भी अपना घर है, जहाँ मेरे बच्चे सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य की ओर बढ़ते हैं।” मुनिवार! एक गुजारिश और है कि इन तीनों देवताओं से कह कर ये आवास वाले मामले का एकीकरण कर दिया जाए ताकि आगे कोई समस्या न हो।
तथास्तु।

In upcoming year if we don’t prepare ourselves things will get Up and down very badly
Yes very true