Recent Posts
आसमा ने काले बादलों से ये कहा क्यों रहे हो तुम गरज क्यों रहे मुझे डरा आयेगा जब सवेरा जाओगे तुम कहा लेके अपनी बुंदुओं को लेके अपनी कालिमा आसमा ने भी नहीं खेली थी कच्ची गोलियां गरज गरज के कह रहे थे वे...
हज़ारों तारे है चांद भी है फिर भी अंधेरा है ऐ जिन्दगी इस रात का क्या कोई सवेरा है चल रहा है हर कोई आंख मूंदे ना दो आवाज यहां हर शख्स बहरा है अके मिलती है बस नदिया यहां पर किसी ने ना पूछा...
चुलबुली सी बुलबुली सी कभी मुरझाई कभी खिलखिली सी फूल सी अनेक रंग की कभी अचल कभी जल तरंग सी वो है कठिन कभी वो सरल सी कभी एक युग कभी एक पल सी कभी नासमझ कभी वो समझ सी कभी वो हसी कभी वो रुदन सी चुलबुली...
ये जो रात अंधेरी काली है वो मैंने भी तो काटी है कुछ रखी है कुछ बाटी है पर मैंने भी तो काटी है जब शाम हुई तब से सोचा था सूरज तो एक दिन देखुंगा चाहे लाख अंधेरे हो जग में मै तारो से ही चल लुंगा पर...
