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रूटीन (भाग-2)

     मैने पूरे पर्दे को एक साइड किया और बाहर देखने लगा। बाहर आसमान में बिजलियां ऐसे चमक रहीं थीं जैसे डिस्को लाइट चमकती हों। फोन उठाकर देखा, उसमें नेटवर्क का कोई नामोनिशान नहीं था। मन में सोचा—बारिश ही तो है, अभी बंद हो जाएगी। चलो, मौसम अच्छा हो गया, अब सफर करने में भी मजा आएगा, नहीं तो वहां तक पहुंचते-पहुंचते गर्मी ही भर्ता बना देती।


       मैने कुछ अच्छे से गाने अपने फोन में लगाए और जाने की तैयारी में लग गया-  फ्रेश हुआ, थोड़ा नाश्ता किया, तैयार होकर सारा सामान चेक किया। अब मैं जाने के लिए तैयार था। गाड़ी नीचे बेसमेंट की पार्किंग में खड़ी थी। मैंने अपना बैग उठाया और अपना डोर लॉक करके सीढ़ियों की तरफ बढ़ा। जैसे-जैसे मैं सीढ़ियों की तरफ बढ़ रहा था, मुझे पानी की आवाजें तेज सुनाई दे रही थीं। मुझे लगा मेरे मकान के ग्राउंड फ्लोर पर रहने वालो ने फिर से अपना नल खुला छोड़ दिया था।


      अरे! मैं आपको उनके बारे में बताना तो भूल ही गया। मैं उस मकान में अकेले नहीं रहता, नीचे ग्राउंड फ्लोर पर एक सज्जन अपने परिवार के साथ रहते थे, परिवार क्या,  बस पति-पत्नी और एक बच्चा। लोग कहते हैं कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं पर इस बच्चे को भगवान का नहीं शैतान का रूप कहना ज्यादा अच्छा होगा। वैसे भी मुझे बच्चे कुछ खास पसंद नहीं, पर यह बच्चा कुछ ज्यादा ही शैतान था। एक बार तो मैंने आस-पास के कुत्तों को उस पर छोड़ ही दिया था। बेचारा बहुत जोर से चिल्लाकर भागा था। उसके मां-बाप को अंदाजा तो लग गया था कि यह हरकत किसकी थी, पर किसी ठोस सबूत के अभाव के कारण वो मुझे कुछ कह नहीं सके थे।  खैर, तो यह थी कुछ जानकारी ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाले की।


        पानी की आवाज सुनते हुए मैं नीचे उतर रहा था। जैसे ही मैंने कुछ कदम सीढ़ियों से आगे बढ़ाए, वहां का नजारा देखकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। बारिश का पानी पूरे ग्राउंड फ्लोर पर फैला हुआ था। फर्श से लगभग दो फुट तक सब कुछ डूब चुका था; लग भी नहीं रहा था कि यहां कोई रहता होगा। मेरी नज़रे ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाले परिवार को ढूंढने लगी, वो सभी लोग कहां चले गए थे? कहीं पानी में डूब तो नहीं गए? पर मुझे कोई पानी में डूबता उतरता तो नहीं दिखा रहा था, पर तभी मेरी नज़र उनके बेडरूम के दरवाजे पर पड़ी, उसपर ताला देखकर मैं समझ गया कि वो यहां से जा चुके थे। वैसे मेरी उनसे कोई खास बातचीत तो नहीं होती थी, सही सही कहूं तो आखिरी बार कब बात हुई थी मुझे याद भी नहीं, पर क्या उनके बेटे के पीछे कुत्ता छोड़ने का उन्होंने बदला लिया था मुझसे? इंसानियत नाम की भी कोई चीज होती है या नहीं? मुझे बिना बताए वो चले गए इस पानी में!!


        अब तो वापस आने के अलावा कोई उपाय न था। जब ग्राउंड फ्लोर तक पानी आ गया था, तो बेसमेंट में तो गाड़ी की जल-समाधि बन गई होगी। ऐसा सोचकर मैं सारा सामान लिए वापस अपने रूम की तरफ बढ़ा। सारा प्लान चौपट हो गया था,और मेरा इस वीकेंड पर घर पर ही रहना तय था। बारिश अगर रुक भी जाती तो कार को रिपेयर करने में ही पूरी छुट्टी चली जाती। निराश मन से मैं अपने कमरे में आया, सारा सामान जमीन पर पटका और बिस्तर पर लेट गया। सारा मूड ही ऑफ हो गया था। अब पूरा दिन क्या किया जाए? बाहर भी नहीं जा सकते, फोन भी नहीं चल रहा था। सुबह जिस उत्साह के कारण नींद जल्दी खुल गई थी अब वो उत्साह काफूर हो चुका था और फिर बची हुई नींद ने पूरा होने के लिए मुझे बुला लिया। नींद जब खुली,  बाहर बादल तब भी अपना तांडव मचा रहे थे। फोन की तरफ देखा, तो अभी भी नेटवर्क नदारद था। ये यहां के नेटवर्क प्रोवाइडर्स वाले! जब इतनी भयंकर बारिश और तूफान आना था, तो पहले ही नहीं बता सकते थे? वैसे तो रोज रोज तरह तरह के मैसेज भेज भेज के दिमाग का दही करते रहते हैं, ये नहीं कि कोई काम की खबर भेज दें।


       खैर, अब मैं कुछ नहीं कर सकता था। कुछ देर अपनी दीवारों को निहारता रहा। इतने दिन रहते हुए कभी इन पर ध्यान नहीं गया, जब मैं यहां पर आया था तो इसकी दीवारें चमकती रहती थीं। अब इनका कलर कुछ डल हो गया था। पागलो की तरह काफी देर उसे घूरने के बाद मै उठा और अपने कपड़े चेंज किए और घर में जैसा रहता हूं वैसी हालत में आ गया—सीधे शब्दों में कहें तो हाफ टी-शर्ट और और हॉफ लोअर में आ गया। यहां कौन ही था मुझे देखने के लिए, पूरे घर में मैं अकेला ही था, और बाहर बारिश के हालात देखकर लग रहा था अभी कुछ दिन ऐसे ही रहना था।


        कपड़े बदलकर मैने अपने कमरे में नज़र दौड़ाई, मेरा कमरा जैसे दुहाई दे देकर मुझे पुकार रहा था, सारा सामान इधर उधर फैला हुआ था, आज तो मेरे पास समय ही समय था। कुछ देर सर खुजाने के बाद मैने घर सफाई अभियान शुरू किया। काफी देर मेहनत करने के बाद मेरा कमरा थोड़ा देखने लायक हो चुका था। हाथ मुंह धोकर किचेन से मै कुछ चिप्स वगैरह ले आया और बिस्तर पर बैठकर खाने लगा, ये फास्ट फूड में ऐसा क्या डालते है कि ज़बान से लगते ही मूड एक दम सही हो जाता है। जैसे जैसे चिप्स खत्म होते जा रहे थे मेरा मूड अच्छा होता जा रहा था। और हो भी क्यों न? जिस तरह के मौसम के लिए मै बाहर जा रहा था वो यही मिल गया था हां बस हरियाली उतनी नहीं थी। पर एक बात और थी जिसने मेरा मूड थोड़ा और सही कर दिया था वो ये कि इस बारिश को देखकर ऐसा लग रहा था कि कुछ दिन तक तो ऑफिस से छुट्टी, कोई रूटीन नहीं, जैसे चाहो वैसे रहो, तो मै बिल्कुल फ्री था, और अभी तो फोन में नेटवर्क भी नहीं आ रहा था, तो किसी का कॉल भी नहीं आ सकता था। नहीं तो अभी तक कम से कम तीन बार घर से फोन आ चुका होता – खाना खाया के नहीं, वही रात का बासी खाना तो नहीं खा लिया? आवाज क्यों धीरे आ रही है?, तबियत तो ठीक है न? और न जाने कितने ही सवाल पूछ पूछ कर घर वालो ने सर खा लिया होता।


   घर वालो के बारे में सुनकर चौकिए नहीं! कही आपने नौकरी की रिक्रूटमेंट के लिए ऊपर वाले द्वारा भेजे जाने को सच तो नहीं मान लिया? अरे! मै तो खीझ कर ऐसा कह रहा था, सच में मै कोई आसमान से नहीं टपका, मेरा भी परिवार है, जो कि लखनऊ में रहता है और मैं यहां चेन्नई में काम करता हूं। अजीब विडंबना है, लोग परिवार के लिए काम करते है उनसे ही दूर रहकर। खैर, अभी तो मै इस बंद कमरे की स्वतंत्रता को जी भरकर जी लेना चाहता था, सब कुछ सामान्य, कोई आपाधापी नहीं, कहीं जल्दी नहीं पहुंचना, कही कोई काम नहीं करवाना बस मौज से पैर फैलाकर लेटना।


   आराम से लेटकर ये सब सोच ही रहा था कि कहीं से ‘टूं-टूं’ की आवाज ने मेरा ध्यान अपनी तरफ खींचा। ऐसी आवाज तो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। क्या नीचे वाले ने जाते-जाते मेरे कमरे में बम फिट कर दिया था? नहीं, ऐसा तो नहीं हो सकता, वैसे भी मेरा कमरा तो अंदर से बंद था। इन सब विचारों
छोड़कर मैंने उस आवाज का पीछा करने का फैसला किया। आवाज के पास पहुंचा तो देखा यह इनवर्टर से आ रही थी। इस आवाज का मतलब था कि इसके प्राण सूखने वाले हैं। लाइट पता नहीं कब से नहीं आ रही थी; लाइट न रहने के विचार से ही मेरे भी प्राण छूटने लगे थे। वैसे तो यहां लाइट बहुत कम जाती थी और जाती भी तो एक आध घंटे के लिए, रात में बिना रुकावट के सो सकू इसलिए एक कम कैपेसिटी का इन्वर्टर लगवा लिया था। बाहर के मौसम को देखकर लगा कि कैपेसिटी ज्यादा होती तो अच्छा होता। अगर जल्दी लाइट नहीं आई तो काम कैसे चलेगा? रोशनी कैसे होगी? पंखा कैसे चलेगा? और फोन! हां फोन कैसे चार्ज होगा? जल्दी से मैं चार्जर की तरफ भागा और फोन को चार्जिंग पर लगा दिया। पर मेरी किस्मत! जैसे ही मैने उसे चार्जिंग पर लगाया, इनवर्टर बैठ गया और पूरे कमरे की लाइट चली गई।
अब घर में मैं अकेला नहीं था, मेरे साथ अंधेरा भी था।

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  1. idselalubet

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