ये हूं मैं!
एक मिनट, आप मुझे देख तो नहीं पा रहे होंगे, मुझे ही अपना विवरण देना होगा। हां तो ये हूं मैं—चढ़ी हुई आँखें, बढ़ी हुई तोंद और उड़े-उड़े बालों के साथ शीशे के सामने टाई पहन रहा हूं। आँखें किसी विशेष द्रव्य के सेवन के कारण नहीं, बल्कि नींद न पूरी होने के कारण चढ़ी हुई हैं। तोंद का तो कुछ कहा नहीं जा सकता, इसकी पकड़ बहुत मजबूत होती है, एक बार जिस पर चढ़ जाए उतरने का नाम ही नहीं लेती है। कसरत तो मुझसे हो पाती नहीं है पर इसकी भरपाई का मैने एक तरीका निकाल लिया है। मै जहां पर भी घर लेता हूं(नहीं मै इतना अमीर नहीं कि जगह जगह घर खरीदता फिरूं, यहां मै किराए के मकान की बात कर रहा हूं) वहां पर मै घर की पहली या दूसरी मंजिल पर रहता हूं, और आने जाने के लिए सीढ़ियों का इस्तेमाल होने से थोड़ी कसरत हो जाती है, अब आप ये भी कह सकते है कि तीसरी चौथी या उससे भी ऊपर की मंजिल पर क्यों नहीं घर लेता तो भैया मुझे ऑफिस जाना भी है और वहां से वापस घर में आना भी है , इतनी ऊंचाई पर सीढ़ियों से मुझसे तो चढ़ते न बनेगा। तो ये हुई मेरी तोंद की बात और जहां तक इन बालों का सवाल है, तो वो भी सुबह देर से उठने और जल्दीबाजी का नतीजा है।
शीशे के सामने खड़े होकर न ही आंखें, न ही तोंद और न ही मेरा उड़े हुए बालों पर ध्यान था; बस एक ही बात मेरे मन में चल रही थी — ये टाई बांधना भी कितने बेकार की चीज है! गले में बांध के घूमो इधर-उधर, लगता है किसी ने गला पकड़ रखा है। दूसरे, कोई स्कूल के बच्चे तो हैं नहीं, अब तो ऑफिस जाने वाले आदमी हैं; फिर बच्चे और बड़ों का ड्रेस एक जैसा क्यों? बच्चों में तो उत्साह रहता है, जीवन नया-नया देखना शुरू किया होता है। हमारे लिए क्या—रोज वही काम, वही नौकरी। मैं तो रोज-रोज ऑफिस जा-जा कर तंग ही आ गया हूं, ऐसा लगता है जैसे मेरा जन्म इसी काम के लिए हुआ हो। यहां नीचे धरती पर इस काम की वैकेंसी आई हो और ऊपर भगवान के पास रिक्वेस्ट भेजकर इस काम के लिए मुझे पैदा किया गया हो। पर रोजी-रोटी इसी से चलती है, तो अब किया भी कुछ नहीं जा सकता।
और ऐसे ही मेरी जिन्दगी यूं ही चली जा रही थी। एक के बाद एक दिन और रात अपनी पाली बदल-बदल कर आते और जाते थे। दिन पहले आता था या रात, कहना मुश्किल है, पर दोनों एक के बाद एक बिना रुके आते-जाते थे। जिन्दगी मुझे चला रही थी या मैं ज़िंदगी को, कुछ पता नहीं। मैं उसके पीछे भाग रहा था या वो मेरे पीछे, किसे पता; बस चल रही थी चक्र जैसी। बीच-बीच में शनिवार और इतवार आकर काली रात में कुछ-कुछ पूर्णिमा का काम कर जाते थे, पर पिछले दो शनिवार और रविवार को ऑफिस की जरुरी मीटिंग के कारण ये भी नसीब नहीं हुई। बस सुबह उठना, तैयार होना, ऑफिस जाना, ऑफिस से घर आना और फिर सो जाना; पिछले दो हफ्ते से यही चल रहा था। घर में टीवी तो वैसे भी नहीं था, क्या ही करता टीवी का जब कुछ देखने का समय ही न मिल पाए। कई बार ‘वर्क फ्रॉम होम’ करने का भी सोचा, पर यहां की गर्मी में घर पर भट्टी में रह कर जलने से अच्छा तो ऑफिस ही चले जाना है। सुबह उठते ही गर्म हवा के झोंके लगने लगते थे। पर इस बार तो मैंने सोच ही लिया था—आने वाले वीकेंड पर घूमने जाने का, वो भी ऐसी-वैसी जगह नहीं, पहाड़ों और बादलों से ढकी जगह, जहां बादल आकर मुझे खुद अपनी ठंडक का एहसास कराते हों। जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे थे, इस वीकेंड घूमने जाने की इच्छा और बढ़ती जा रही थी।
आखिरकार वो दिन आ ही गया था,सुहानी प्यारी सुबह! कार को कल रात ही तैयार कर लिया था, और बाकी सामान की तो तैयारी मैं पूरे हफ्ते ही करता रहा था—खाने के लिए कुछ ड्राई फ्रूट आइटम्स, साफ कपड़े, पावर बैंक आदि। आज सुबह नींद भी जल्दी खुल गई, पर आज गर्मी का अहसास कुछ कम हो रहा था। मुझे लगा कि कहीं मैं सपने में तो नहीं हूं और सपने में पहाड़ों पर पहुंच गया हूं जिससे मौसम ठंडा लग रहा है। मैंने आंखें मलते हुए अपनी खिड़की को खोला, तो नींद के कारण मेरी जो आंखें छोटी-छोटी थीं, वो फैल कर चौड़ी-चौड़ी हो गईं। मेरे घर के बाहर जहां रोड हुआ करती थी, वहां आज जैसे नदी बह रही थी और आसमान में जहां गरम-गरम हवाएं चलती थीं, वहां आज पानी वाले बादल तैर रहे थे। मैंने सोचा ये क्या हुआ? आज तक जो माहौल भट्टी जैसा बना हुआ था, वो एकदम से कैसे चेरापूंजी बन गया था?…….
