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रूटीन (भाग -1)

ये था मैं!

एक मिनट, आप मुझे देख तो नहीं पा रहे होंगे, मुझे ही अपना विवरण देना होगा। तो हां जनाब, ये था मैं— चढ़ी हुई आँखें, बढ़ी हुई तोंद और उड़े-उड़े बालों के साथ शीशे के सामने टाई पहन रहा था।


आँखें किसी विशेष द्रव्य के सेवन के कारण नहीं, बल्कि नींद न पूरी होने के कारण चढ़ी हुई थीं और तोंद! तोंद का तो कुछ कहा नहीं जा सकता, इसकी पकड़ बहुत मजबूत होती है, एक बार जिस पर चढ़ जाए उतरने का नाम ही नहीं लेती है। कसरत तो मुझसे हो नहीं पाती, पर इसकी भरपाई का मैने एक तरीका निकाल लिया था। मै यहाँ चेन्नई में जहां पर भी घर लेता था, अरे नहीं ! मै इतना भी अमीर नहीं कि जगह जगह घर खरीदता फिरूं, यहां मै किराए के मकान की बात कर रहा हूं, तो यहां मै जहां जहां भी घर लेता था वहां पर मै घर की पहली या दूसरी मंजिल पर रहता था, और आने जाने के लिए सीढ़ियों का इस्तेमाल होने से थोड़ी कसरत हो जाती थी। अब आप ये भी कह सकते है कि मैं तीसरी,चौथी या उससे भी ऊपर की मंजिल पर क्यों नहीं घर लेता? तो भैया! मुझे ऑफिस जाना भी है और वहां से वापस घर में आना भी है। इतनी ऊंचाई पर सीढ़ियों से मुझसे तो चढ़ते न बनेगा। तो ये तो हुई मेरी तोंद की बात और जहां तक बालों का सवाल था, तो वो भी सुबह देर से उठने और जल्दीबाजी का ही नतीजा थे।


      शीशे के सामने खड़े होकर न ही आंखें, न ही तोंद और न ही मेरा उड़े हुए बालों पर ध्यान था; मेरे मन में बस एक ही बात चल रही थी — ये टाई बांधना भी कितने बेकार की चीज है! गले में बांध के घूमो इधर-उधर, लगता है किसी ने गला पकड़ रखा है। दूसरे, कोई स्कूल के बच्चे तो हैं नहीं, अब तो ऑफिस जाने वाले आदमी हैं; फिर बच्चे और बड़ों का ड्रेस एक जैसा क्यों? बच्चों में तो उत्साह रहता है, जीवन नया-नया देखना शुरू किया होता है। हमारे लिए क्या—रोज वही काम, वही नौकरी। और मैं तो रोज-रोज ऑफिस जा-जा कर तंग ही आ गया हूं, ऐसा लगता है जैसे मेरा जन्म इसी काम के लिए हुआ हो, धरती से इस काम की वैकेंसी आई हो और ऊपर भगवान ने मुझे इस काम के लिए रिक्रूट कर दिया हो। पर रोजी-रोटी इसी से चलती है, तो अब किया भी कुछ नहीं जा सकता।


      ऐसे ही मेरी जिन्दगी यूं हीं चली जा रही थी। एक के बाद एक दिन और रात अपनी पाली बदल-बदल कर आते और जाते थे। दिन पहले आता था या रात, कहना मुश्किल था, पर दोनों एक के बाद एक बिना रुके आते-जाते थे। जिन्दगी मुझे चला रही थी या मैं ज़िंदगी को, कुछ  पता नहीं,  मैं उसके पीछे भाग रहा था या वो मुझे अपने पीछे भगा रही थी, किसे पता; बस चल रही थी चक्र जैसी। बीच-बीच में शनिवार और इतवार आकर काली रात में कुछ-कुछ पूर्णिमा का काम कर जाते थे, पर पिछले लगातार तीन शनिवार और रविवार को ऑफिस की जरुरी मीटिंग होने के कारण ये भी नसीब नहीं हो पाई थी। बस सुबह उठना, तैयार होना, ऑफिस जाना, ऑफिस से घर आना और फिर सो जाना; पिछले तीन हफ्ते से यही चल रहा था। घर में टीवी तो वैसे भी नहीं था, जो कुछ मनोरंजन होता,और क्या ही करता टीवी का जब कुछ देखने का समय ही न मिल पाए?


   बार- बार  के ऑफिस जाने के रूटीन से तंग आ कर कई बार मैने ‘वर्क फ्रॉम होम’ करने का भी सोची, पर यहाँ की गर्मी में घर पर में रह कर फ्राई होने से अच्छा तो ऑफिस ही चले जाना था। सुबह उठते ही गर्म हवा के झोंके लगने लगते थे। ऐसा लगता था कि जैसे किसी भट्टी में बैठा हूँ।


      पर अब बहुत हो चुका था और इस बार तो मैंने सोच ही लिया था—आने वाले वीकेंड पर घूमने जाने का, और वो भी ऐसी-वैसी जगह नहीं, पहाड़ों और बादलों से ढकी जगह!  जहां बादल खुद आकर अपनी ठंडक का एहसास कराते है। जहाँ की हरियाली की गोद में बैठकर आप बस नजारों का अनादं लेते हैं,जहाँ कोई रूटीन नहीं होता जब चाहे, जैसे चाहे कुछ भी करने की आज़ादी होती है।
बस अब ये तय था।


       जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे थे, आने वाले वीकेंड में घूमने जाने की इच्छा और भी बढ़ती  जा रही थी। और आखिरकार वो दिन आ ही गया। प्यारी सुहानी सुबह! कार को तो एक रात पहले ही तैयार कर लिया था, और बाकी सामान की तो तैयारी मैं पूरे हफ्ते ही करता रहा था—खाने के लिए कुछ ड्राई फ्रूट आइटम्स, साफ कपड़े, पावर बैंक और दूसरी कुछ जरूरत की चीजें।


       सुबह नींद भी जल्दी खुल गई, पर उठने पर गर्मी का अहसास कुछ कम हो रहा था। मुझे लगा कि कहीं मैं सपने में तो नहीं हूं और सपने में  पहाड़ों पर पहुंच गया हूं जिससे मौसम ठंडा लग रहा है। या फिर मैं आज जल्दी उठ गया हूं और सुबह का मौसम तो वैसे ही ठंडा होता ही है। यही सोचते और आंखें मलते हुए मैने अपनी खिड़की के पर्दे को थोड़ा सा खोला, तो नींद के कारण मेरी जो आंखें छोटी-छोटी थीं, वो फैल कर चौड़ी-चौड़ी हो गईं। मेरे घर के बाहर जहां रोड हुआ करती थी, वहां जैसे नदी बह रही थी और आसमान में जहां गरम-गरम हवाएं चलती थीं, वहां पानी वाले बादल तैर रहे थे। मैंने सोचा ये क्या हुआ? आज तक जो माहौल भट्टी जैसा बना हुआ था, वो एकदम से कैसे चेरापूंजी बन गया ?

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