आज पहली बार वह घर से इतना दूर आई थी, वह भी अपने बाबा के साथ। नहीं तो हमेशा उसकी बहनें साथ-साथ रहती थीं। घर की सबसे छोटी होने के कारण ही शायद उसे थोड़ा प्यार मिल भी गया था, नहीं तो उसकी बहनों की तरह उसे भी डांट और फटकार ही नसीब होती, पर शायद आज उसके जीवन का सबसे अच्छा दिन था। कम से कम उसे तो ऐसा ही लग रहा था। हाँ, कई मायनों में यह सही भी था, आज बाबा उसे अपनी टूटी-फूटी झोपड़ी और कूड़े के ढेरों से पटे मोहल्ले से दूर इतनी अच्छी जगह ले आए थे और उन्होंने उसे एक बहुत ही सुंदर सा झबला भी लाकर दिया था, जिसे पहनकर वह बहुत खुश थी।
दोनों अपने घर से बहुत दूर निकल आए थे। उनकी मन्ज़िल शहर का एक बहुत बड़ा पार्क थी। कुछ समय बाद दोनों ही उस बड़े और सुंदर पार्क के बाहर खड़े थे। भले ही पिता ने उसे नया झबला ला कर दिए था पर वो खुद फटे-पुराने कपड़े में था जिसपर उसके कंधे पर टंगा एक पुराना सा झोला उसकी दरिद्रता को गाढ़ी रेखा से रेखांकित कर रहा था।
उस पार्क के इतने बड़े गेट को देखकर, उसका छोटा सा मुँह खुला का खुला रह गया था
“हाँ!! बाबा, कितना बड़ा गेट है बाबा!” उसने आश्चर्य से पूछा।
पिता ने बस हाँ में सिर हिला दिया था।
“घर से यह कितना दूर है बाबा? ये कौन सी जगह है बाबा? यहां कौन रहता है बाबा …?
ऐसे जाने कितने ही सवाल उसने पूछ डाले थे एक ही सांस में।
“यह बगीचा है बेटा, चलो अंदर चलो।” पिता ने बिना किसी भाव से उससे कहा।
दोनों उसके अंदर चल पड़े थे। उस पार्क की खूबसूरती सभी जगह से अलग थी। बड़े-बड़े पेड़, बहुत बड़ा सा पानी का कुंड, उसमें आसमान को छूते हुए फव्वारे, रंग-बिरंगे फूलों के पौधे, हरी-हरी नरम घास, मन को अच्छा लगने वाला सभी कुछ था वहाँ।
अपनी छोटी-छोटी आँखों को उसने बड़ा-बड़ा करते हुए उस सारे नज़ारे को उसमें भरने की कोशिश की, पर वे सभी उसकी सीमा से परे थे। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था, हर तरफ अलग-अलग चीजों पर नज़र डालते हुए उसके चेहरे के भाव और भी सुंदर बनते जा रहे थे। आज तक उसने इतनी अच्छी जगह नहीं देखी थी और न ही इस जगह पर मिलने वाली अधिकांश चीजें उसे कभी नजर भी आई थीं।
“बाबा वो क्या है?” अपनी छोटी सी उंगली से इशारा करते हुए उसने कहा।
“वो फव्वारा है बेटा।” पिता ने जवाब दिया।
“फव्वारा क्या होता है बाबा?”
“जब पानी ऊपर से नीचे गिरता है तो उसे फव्वारा कहते हैं।”
“अच्छा बाबा।”
पक्षियों के चहचहाने की आवाजें हर तरफ से आ रही थीं, सुंदर रंग-बिरंगी तितलियाँ कभी इस फूल पर तो कभी दूसरे फूल पर मँडराकर उन्हें जगा रही थीं। वह दौड़कर एक फूल पर बैठी तितली के पास पहुंची, उसने उसे पकड़ने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया पर तितली उड़ गई। वह उसका पीछा करने लगी , तितली भी जैसे समझ चुकी थी कि ये यहां नई आई थी और शायद वह भी उसे वहाँ के सारे फूलों को दिखाना चाहती थी। कभी तितली इस फूल पर बैठती तो कभी दूसरे फूल पर, जब भी वह उसे पकड़ने जाती, वह तुरंत उड़ जाती।
“बेटा आओ आगे चलते हैं।”
वह दौड़कर पिता के पास पहुंची।
“ये कितनी अच्छी जगह है बाबा!, और ये कपड़ा कितना सुंदर है बाबा!” उसने अपना पहना हुआ झबला दिखाते हुए कहा।
“बाकी सबको क्यों नहीं लाए बाबा?”
“आज तुम्हारा जन्मदिन है, इसलिए तुमको लाए हैं। जब उनका होगा तो उनको भी ले आएंगे।”
“जन्मदिन? वो क्या होता है बाबा?” उसने बड़े भोलेपन से कहा।
“जब कोई पैदा होता है तो उसे जन्मदिन बोलते हैं।
“पैदा मतलब?”
“जब माँ के पेट से निकलते हैं तो उसे पैदा होना बोलते हैं।”
“है! मैं माँ के पेट से निकली हूँ?” चौंककर उसने कहा।
“हाँ।”
“और सोनी दीदी?”
“हाँ, वो भी।”
“और सौम्या दीदी?”
“हाँ, वो भी।”
“और पूजा दीदी?”
“हाँ, वो भी।”
“और…”
“हाँ-हाँ, तुम और तुम्हारी सारी बहनें माँ के पेट से ही निकली हैं।” पिता ने उसकी बात को बीच में ही काटते हुए कहा।
“सच्ची?” उसकी भोली सुंदर आंखे बड़ी बड़ी होकर और भी सुन्दर लगने लगी थीं।
“हाँ।”
“माँ के पेट के अंदर कितने लोग रहते हैं बाबा?” उसने मासूमियत भरा सवाल पूछा।
“लोग नहीं, बच्चे रहते हैं।” पिता ने बात संभालते हुए कहा।
“और कितने बच्चे हैं माँ के पेट में?” उसने नया प्रश्न पूछा।
“बस एक तुम्हारा भाई आ जाए, बस उतने तक।”
“भाई!!! मेरा भाई!” वह खुशी से उछल पड़ी।
“मेरा भाई कब आएगा बाबा?”
“पता नहीं बेटा।” पर मै जल्द ही उसे लाऊँगा
“आप लेकर आएंगे ना बाबा?”
“हाँ।”
उसने पिता की उंगली पकड़कर नीचे खींचा और उसे जोर से गले लगा लिया।
“आप कितने अच्छे हैं बाबा।”
दोनों आगे बढ़ चुके थे। आगे बढ़ते हुए उसकी आँखों की चमक दुगुनी हो गई थी, ढेर सारे तरह-तरह के झूले! और उसे झूलते हुए ढेर सारे बच्चे! वह दौड़कर उन झूलों के पास पहुंची, कभी इस झूले पर तो कभी दूसरे झूले पर। इधर-उधर भागते हुए वह उसी तितली के जैसी लग रही थी जो एक फूल से दूसरे फूल पर मँडराती हो।
उसे झूले पर झूलता देख पिता पास ही घास पर जाकर बैठ गया और उसे एकटक निहारता रहा। काफी देर तक वह सभी झूलों पर झूलती रही, उसे तो किसी भी चीज की सुध नहीं थी। कुछ देर बाद पिता घास से उठा और उसे वहीं से आवाज देकर बुलाया। उसने अपने पिता की तरफ देखा फिर वो उसकी तरफ दौड़ी।
“क्या हुआ बाबा?”
“बहुत देर हो गई है बेटा, कुछ खा लो फिर जाकर खेलना।”
“ठीक है बाबा।”
पिता ने अपने पुराने से झोले में से कागज में लिपटा हुआ नमकीन रोटी का टुकड़ा निकाला और उसे थमा दिया। उसने उसे जल्दी जल्दी बड़े ही चाव से खाया जैसे वो कोई बहुत ही स्वादिष्ट चीज़ खा रही हो।उसे खत्म करते ही वो फिर से झूलों की तरफ दौड़ पड़ी।
काफी देर खेलने के बाद वह पिता के पास आ पहुंची और सीधे उसकी गोदी में जाकर बैठ गई।
“थक गई क्या बेटा?”
“हाँ बाबा।”
दोनों वहीं घास पर लेट गए। वह थकी तो हुई थी पर उसकी आँखों से नींद गायब थी, वह ऊपर आसमान को एकटक निहारे जा रही थी।
माँ भी यहाँ आती तो कितना अच्छा रहता बाबा।”
“हूँ…”
“सभी लोग आते तो कितना अच्छा रहता बाबा।”
“हूँ…”
“हम लोग यहीं रहेंगे बाबा।”
“ठीक है।”
“सच्ची?”
“हूँ…”
थोड़ी देर वैसे ही लेटे रहने के बाद उसकी ऊर्जा फिर से पूरी हो गई थी, उसने अपने पिता का हाथ पकड़ा और उसे उठाने लगी।
“बाबा उठो, चलो आगे चलते हैं, आगे और क्या-क्या है?” मुझे देखना है
पिता उठा और उसे लेकर आगे बढ़ गया। दोनों को घूमते हुए काफी समय हो गया था। शाम भी होने वाली थी। बच्चे बहुत ही जल्दी एक चीज से ऊब जाते है उसके साथ भी ऐसा ही था। वो भी उस पार्क से बोर हो गई थी।
“बाबा हम लोग घर कब चलेंगे” उसने अपने पिता का हाथ खींचते हुए पूछा।
“चलेंगे बेटा” पिता ने कहा।
“कब चलेंगे बाबा, मुझे अम्मा की याद आ रही है”
“जल्दी ही चलेंगे, आओ थोड़ी देर इस पर बैठते हैं” एक बेंच की तरफ इशारा करते हुए पिता ने कहा था।
दोनों जाकर उस बेंच पर बैठ गए और इधर उधर देखने लगे, पर अब उसका मन वहां नहीं लग रहा था उसने फिर से अपने पिता से कहा–
“बाबा घर”
“ह्म्म्म”
पिता ने अपने पुराने झोले से एक पानी की बोतल निकाली और उसे उसके पास रख दी।
“बेटा तुम यही बैठो मै अभी आता हूं” पिता ने कहा
“कहाँ जा रहे हैं बाबा”
“कही नहीं बस अभी आ रहा हूं”
“जल्दी आना बाबा”
“ह्म्म्म”
उसने पानी की बोतल को पकड़ कर अपने पास सटा लिया था। वो बस इधर उधर देखती जा रही थी। पिता धीरे धीरे चलते हुए उसकी आंखों से ओझल हो गया था।
कुछ देर बाद,
शाम गहराने लगी थी, वो अभी भी बेंच पर ही बैठी थी।
“बाबा!! बाबा!!” बहते हुए आंसुओं के साथ वो बस यही बोले जा रही थी।
बोतल को कस कर पकड़े, रोते हुए, वो बस अपने बाबा को बुला रही थी, पर वो नहीं आया।

बेहद शानदार भैया जी लेकिन ये कहानी अभी अधूरी है दुआ करेंगे कि वो समय आने पर कहानी को पूरा किया जा सके।
Thank you
Uss pita ki intensity kya thi?
Kya wo kisi wajah se nahi aa saka ya uss bechari ladki ko akele hi chhor kar chala gaya?
उसका पिता उसे वहाँ छोड़ने ही आया था। बेटे की चाहत में उससे पहले उसकी कई बेटियाँ हो चुकी थीं। गरीबी और अशिक्षा के कारण आज भी लोग बेटियों को बोझ समझते हैं। वह भी वैसा ही कर रहा था।
पर यहाँ उस पिता की भावनाएँ भी दिखती हैं, जब वह उसे पहली और आख़िरी बार ही सही, उसके जन्मदिन पर उसे पार्क ले जाता है और दिन भर उसकी मनपसंद चीज़ें करवाता है। उसे अच्छे कपड़े पहनाता है,यह सोचकर कि जिसे भी वह मिलेगी, वह उसे अच्छे घर की समझकर अपना ले।
वह उसे किसी खराब जगह भी छोड़ सकता था, पर उसने ऐसा नहीं किया। शायद वो भी अपनी बेटी से उतना ही प्यार करता था पर मजबूर था।
Sayad mujhe isme uss garib pita ki majboori dikh rahi hai jo halato se haar kar apni beti ko iss beraham duniya me akele jeene ke liye chhor gaya.
Lekin use aisa nahi karna chahiye tha 😢
मजबूरी के साथ साथ यहां समाज की सोच भी जिम्मेदार है जो सिर्फ बेटों को ही आधार बनाती है। कहावत भी है कि बेटियां नसीब और बेटे दुआओं से आते हैं। जिस समाज में ऐसी सोच रहेगी वह बेटे की चाहत में बेटियां पैदा होती रहेंगी और कभी जन्म से पहले ,कभी जन्म के समय ,कभी उसके बाद कहीं न कहीं छोड़ी ही जाती रहेंगी।
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