मैने जल्दी से फोन की टॉर्च जलाई , फिर खिड़की का पर्दा हटाया। बाहर से कुछ रोशनी आनी शुरू हुई। फोन की टॉर्च बंद की, तभी बाहर से बहुत ही तेज बिजली चमकी और पूरा कमरा रोशनी से नहा गया। अभी तो फिलहाल मुझे लाइट की जरूरत नहीं थी। बाहर से रह रह कर बिजली मेरे कमरे को रोशनी से नहला दे रही थी, मौसम भी ठंडा था तो पंखा बंद होने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। पावर बैंक तो था ही,तो फोन चार्ज करने की भी दिक्कत नहीं थी। पीने के पानी की भी कोई चिंता नहीं थी क्योंकि आर.ओ. में पांच लीटर पानी स्टोर था ही, वैसे तो बिना लाइट के वो काम नहीं करता, पर पांच लीटर पानी एक आदमी के पीने के लिए बहुत था। कुल मिलाकर सब ठीक था(ऐसा मेरा सोचना था) तो बस मैने पूरी खिड़की खोली और वहीं खिड़की के पास कुर्सी डालकर बैठ गया। बाहर तेज बारिश की बौछार सभी ओर पड़ रही थी। बाहर से बारिश की हल्की छींटे और ठंडी हवाएं आकर मेरे बदन को सराबोर करने लगीं। मेरे सारे बदन में सरसरी सी फैल गई। कुछ देर वहीं खिड़की के पास बैठा बाहर के नजारों का आनंद लेता रहा। कुछ देर बाद मेरी नजर खिड़की के बाहर एक कोने में चिड़िया के घोंसले की तरफ गई। ‘यहां चिड़िया का घोंसला भी है?’ मैंने खुद से पूछा। घोंसला पुराना था क्योंकि उसमें चिड़िया के बच्चे भी थे। ध्यान से देखा तो ये ‘पचाई पूरा’ था यहां का स्टेट बर्ड, ये तो बहुत शर्मिला होता है और जंगलों में पाया जाता था, वैसे यहां के चिड़ियाघर में भी था एक बार मै वहां गया था पर ये नहीं दिखा था, और आज इसका पूरा परिवार देखने को मिल गया। हल्की हल्की बौछार उस पर और उसके बच्चों पर पड़ती थी वो आंख बंद करके अपने शरीर और पंख झटकते थे , उन्हें ऐसा करते हुए देखना बहुत ही आनंददाई था। उन्हें यूं ही देखता जाने कितनी देर मैं वहां बैठा रहा।
धीरे धीरे शाम हो गई थी, मै वहां से उठा और किचेन में जा कर कुछ खाना बनाने के लिए देखने लगा, पर लाइट चली जाने से वहां पर भी अंधेरा था, फोन की टॉर्च जलाई और काम करने लगा, तभी ध्यान आया कि कई पार्टियों के केको की मोमबत्तियां मैने इक्ट्ठी करके रखी हैं, आज उनको इस्तेमाल करने का समय आ गया था, मोमबत्ती ढूंढने लगा,उन्हें जला कर किसी तरह से कुछ खाने को बनाने लगा, मोमबत्तियां छोटी छोटी थी और बहुत जल्दी जल्दी खत्म हो जा रही थी पर मेरे पास बहुत सा स्टॉक था। किसी तरह मैने खाना बनाया पर मेरा मोमबत्तियों का स्टॉक पूरी तरह खत्म हो गया था किसी तरह आज का काम तो हो गया था पर अगर आगे भी ऐसा मौसम रहेगा तो दिन में ही रात के लिए भी खाना बनाना पड़ेगा।
रात को मै चैन से सो गया इस आशा में कि कल सब कुछ ठीक मिलेगा पर सुबह होने पर पता चला कि हालात और भी खराब हो गए है। बाहर बहुत जोर से हवाएं और बारिश चल रही थी लगता था जैसे कोई चक्रवात आ गया था। नीचे जहां अभी तक दो फुट पानी था वो बढ़कर मेरे कमरे से निकलकर नीचे जाने वाली सीढ़ियों तक आ गया था। फोन में अभी भी नेटवर्क का कोई नामोनिशान नहीं था। और लाइट अभी भी नहीं आई थी। घर से फोन आने का समय हो गया था पर नेटवर्क न होने की वजह से कोई कॉल नहीं आ का रहा था। मुझे भी चिंता हुई कि यहां चक्रवात आने की खबर मेरे घर वालो को तो अब तक मिल चुकी होगी, और घर वाले मेरा फोन न मिलने से परेशान होंगे, मैने नेटवर्क की तलाश शुरू की घर के एक कोने से दूसरे कोने में बाथरूम में, किचेन में खिड़की के पास कही नेटवर्क नहीं आ था था, फिर मै अपने कमरे से बाहर निकल कर सीढ़ियों से होता हुआ छत की तरफ बढ़ा ये सोचकर कि शायद वहां कुछ सिग्नल मिल जाए। छत पर पहुंच कर मै किनारे खड़ा था , नेटवर्क बहुत थोड़ा आकर चला जाता था। मै समझ गया था कि ये मुझे और आगे बढ़ने को कह रहा था मै नीचे से छाता लेकर आया और छत के बीचों बीच जानकर खड़ा हो गया, बहुत तेज हवाएं और बारिश हो रहीं थी पर नेटवर्क आ चुका था। मैने घर पर कॉल लगाया और घर वालो को अपने सुरक्षित होने की खबर दी।
अगले आने वाले दो दिन मेरे ऐसे ही बीते, न बारिश कम हुई और न ही लाइट आई, पानी खत्म होने की कगार पर आ गया था, पावरबैंक की भी सिर्फ दो लाइनें बची थीं। मै खुद सुबह शाम छत पर जा कर घर वालो को अपने जिंदा बचे रहने की खबर देता रहता था। रूटीन का र भी नहीं बचा था। हर दिन जैसे नया होता था। इस एडवेंचर वाली लाइफ से तो मेरी वो रोज की रूटीन वाली लाइफ ही अच्छी थी, कम से कम अगले पल क्या होना है पता तो रहता था। एक दिन और ऐसा रहा तो पीने का पानी पूरी तरह खत्म हो जाता और मुझे बारिश के पानी को इक्ट्ठा करके उसे उबाल कर पीने के अलावा और कोई उपाय न बचता। उस रात को सोने जाने से पहले मैने एक बड़ा सा पतीला छत पर ले जाकर रख दिया ताकि इसमें पानी इक्ट्ठा हो सके और उसे अगल बगल से ईटो से दबा दिया कि कही तेज हवा से ये उड़ न जाए। अब यही मेरा सहारा था, उसे ही मैं सुबह उबाल कर रखने वाला था। सोने से पहले मेरे मन में बस कल को लेकर ही चिंता थी कि आने वाला कल क्या नया रंग दिखाता है यही सोचते सोचते मैं सो गया। सुबह जब नींद खुली तो चमत्कार तूफान थम चुका था बारिश भी बंद हो चुकी और हां सबसे मुख्य बात लाइट और फोन का नेटवर्क भी आ चुके थे। अब सब कुछ सामान्य हो चुका था। मैने एक राहत भरी सांस ली और अपने फोन को चार्जिंग पर लगा दिया।
अब मै दोबारा अपने पुराने रूटीन पर आ सकता था, और मै चकित था ये जान कर की उस पुराने ढर्रे पर जाने के लिए मै खुश था।
तो हां ये हूं मै।
वैसे तो आपके मन में मेरे द्वारा बताई गई सारी बातें चित्र जैसे चल रहीं होंगी पर फिर भी ‘ये हूं मै’ कहने से आप मेरी वर्तमान स्थिति नहीं बना पा रहे होंगे तो फिर से मुझे ही अपना विवरण बताना होगा।
तो हां जनाब ये हूं- मै चमकती हुई आँखें, सलीके से झाड़े गए बाल, चेहरे पर मुस्कान (हां हां तोंद नहीं पिचक गई है वो वैसी की वैसी ही है) शीशे के सामने खड़ा होकर टाई पहन रहा हूं।
अब मै रोज सुबह सुबह ही अपने घर फोन करके बात कर लेता हूं।कमरे की लगभग रोज सफाई भी कर देता हूं। और मेरी खड़की के बाहर बने घोसले के पचाई पूरा और उसके सारे बच्चों के लिए दाना भी डालकर,अच्छे से तैयार होकर मै अपनी रूटीन की जॉब करने के उत्साहित रहता हूं।
