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लखनऊ मेट्रो

‘आज तो ऑफिस के लिए लेट हो जाऊंगा’
कहते हुए मैं मुंशीपुलिया मेट्रो स्टेशन के बाहर बनी एस्केलेटर की सीढ़ियों पर तेजी से चढ़ने लगा। चूंकि मैं लेट हो रहा था और ऊपर से यह लखनऊ मेट्रो जो लेट होने पर जैसे लगता है कि धीरे-धीरे रेंग-रेंग कर एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन पर जाती है, तो मैं बिना आगे देखे, पैरों को संभालते और नीचे देखते हुए ऊपर चढ़ने लगा। मेरा ध्यान सामने नहीं था, तेजी से चढ़ते हुए मैं एस्केलेटर पर खड़ी एक मोहतरमा से जा टकराया। वह मैडम तो आराम से एस्केलेटर पर खड़ी हो जा रही थीं, मैंने ही पीछे से टक्कर मार दी। जैसे ही टक्कर हुई, वह गुस्से से मुड़ीं, मैं घबराया और तुरंत सॉरी बोला और उनके बगल से निकलने लगा। जैसे ही मैं उनके बगल से गुजरा, हवा में मोगरे या शायद किसी महंगे परफ्यूम की महक तैर गई। उस भागदौड़ वाले स्टेशन पर, वह एक पल के लिए ठहर जाने जैसा अहसास था, पर वहां ज्यादा देर रुकना सही नहीं था, इसीलिए दुर्घटनास्थल से मैं आगे बढ़ चला। तेजी से मैं काउंटर की तरफ बढ़ा, दो-चार लोग पहले से ही वहां लाइन लगाकर खड़े थे। तीन-चार मिनट बाद मेरा भी नंबर आ ही गया। मैंने जल्दी से पैसे निकाले और बोला-
‘हजरतगंज’
30 रुपए काटकर उसने बाकी पैसे मुझे वापस कर दिए।
मैं तेजी से मुड़ा और मुड़ते ही फिर से किसी से टकरा गया। इस बार गलती सिर्फ मेरी ही नहीं थी, तो दोनों लोगों ने सॉरी बोला। मेरी नज़र उन पर पड़ी तो ये वही मैडम थीं। सॉरी-सॉरी कहकर हम दोनों अपने रास्ते हो गए। चेकिंग हुई, मैं आगे बढ़ा, ट्रेन शायद निकलने वाली ही थी तो मैं तेजी से भागा, ताकि यह ट्रेन न छूट जाए नहीं तो पांच मिनट और लेट हो जाता। मैं भागा, एस्केलेटर से होते हुए आगे बढ़ा, पर मेरे सामने ही मेट्रो का दरवाजा बंद हो गया और मैं बाहर ही रह गया, अब तो लेट होना तय था। अगली मेट्रो पांच मिनट बाद ही आनी थी, मैं वहीं इंतजार करने लगा था और कोई चारा भी तो नहीं था, तभी एस्केलेटर से एक सर ऊपर आता दिखाई दिया। अंदाजा तो लग गया था कि कौन है पर जब वह ऊपर आईं तो कन्फर्म भी हो गया। ये वही मैडम थीं जिनसे मैं दो बार टकरा चुका था। उन्हें आते देख मैंने पता नहीं क्यों अपना मुंह दूसरी तरफ कर लिया। खैर, वह आकर मेरे बगल में ही खड़ी हो गई थीं और मैं अपना मुंह स्टेशन के अंतिम छोर पर लगाकर खड़ा हो गया था; अगर कोई मुझे देखता तो उसे शायद यह भी लग सकता था कि मैं उस अंतिम छोर से जाकर कूदने की सोच रहा हूं। पर मैं खुद को ऐसे दिखाने की कोशिश कर रहा था मानो मैं स्टेशन के आर्किटेक्चर का बारीकी से अध्ययन कर रहा हूं।

ये आने वाले पांच मिनट मुझे बड़े लंबे लगने लगे थे, खैर किसी तरह से आधा घंटा, मेरा मतलब है कि पांच मिनट बीते और मेट्रो आ गई। ऑफिस का समय होने के कारण जो कोच मेरे सामने रुका उसमें कुछ ज्यादा ही भीड़ थी। खिड़की से एक सीट मुझे खाली दिख गई थी, जैसे ही दरवाजा खुला मैं तुरंत उधर दौड़ा। शायद वह मैडम भी मेरे पीछे-पीछे उसी सीट के लिए आई थीं। पर मैं तेजी से जाकर उस सीट पर बैठ गया, और वह मैडम अनमने मन से मेरे सामने आकर खड़ी हो गईं। मैंने उन्हें देखा और एक सेकेंड बाद एक सज्जन पुरुष की तरह वहां से उठ खड़ा हुआ और उन्हें अपनी सीट ऑफर कर दी। पहले तो उन्होंने मना किया फिर वह उस पर बैठ ही गईं। भूतनाथ आते-आते उनके बगल की सीट भी खाली हो गई जिस पर मैं जाकर बैठ गया। मैंने बैठकर एक लंबी सी सांस ली और उन मैडम की तरफ देखकर हल्की सी मुस्कान दी पर उन मैडम का ध्यान तो अपने फोन पर था। मैंने पूरे कोच में नजर दौड़ाई लगभग सभी लोग अपने-अपने फोन में घुसे हुए थे। मैंने इसे लखनऊ मेट्रो की रीत समझकर अपना भी फोन निकाल लिया और उसमें बिना मतलब के कभी फेसबुक तो कभी व्हाट्सएप खोल-खोल कर देखने लगा। मेरे बगल में बैठे एक शख्स तो पहले व्हाट्सएप पर दूसरों के स्टेटस देख रहे थे, फिर उन्होंने अपना स्टेटस देखना शुरू कर दिया, फिर उन्होंने उनका स्टेटस किसने-किसने देखा, यह देखना शुरू कर दिया। मैंने मन ही मन कहा – धन्य हो जुकरबर्ग बाबा जिसने नई कहावत शुरू कर दी है:

“स्टेटस देखन मैं चला
देख लियो सब कोई
फिर स्टेटस खोला आपणा
को को देखा मोई”

उनको उनके स्टेटस में छोड़कर मैंने फिर इधर-उधर नज़र दौड़ाई। पर मेरा ध्यान बार-बार उन्हीं मैडम की तरफ जा रहा था। पहले तो लगता था कि मेट्रो कितनी स्लो चलती है, आज लग रहा था कि मेट्रो बस चलती ही जाए धीरे-धीरे जैसे बैलगाड़ी चलती है। सोच रहा था कि मैडम से एक बार मुखातिब होकर उन्हें सामने से सॉरी बोल दूं। फिर मन में आता कि कहीं वह मुझे कोई ऐसा-वैसा न समझ लें। ऐसे ही कितनी चीजें सोचते-सोचते बादशाह नगर आ गया। बादशाह से याद आया कि भैया हम तो लखनऊ के निवासी हैं, यहां की तहजीब तो दुनिया भर में मशहूर है। अगर मैं नज़ाकत और तहज़ीब से उनसे मुखातिब होऊंगा तो शायद बात बन सकती है। बादशाह नगर से मेट्रो निकल चुकी थी, और मेरे मन का डर भी। मैंने खुद को संभाला, लखनऊ की मशहूर तहज़ीब को मन में दोहराया और मन ही मन सोचा कि —’गुस्ताखी माफ, आज सुबह की खताओं के लिए लखनऊ की लाजवाब चाय के साथ माफी मांगी जा सकती है क्या?’

एक संजीदा मुस्कान के साथ मैं उनकी तरफ मुड़ने ही वाला था… कि तभी घोषणा हुई—’अगला स्टेशन आईटी कॉलेज है।’ और वह मैडम पर्स संभालकर दरवाजे की तरफ बढ़ गईं। मैं बस देखता रह गया। कम्बख्त, लखनऊ मेट्रो के स्टेशन भी! कभी जल्दी होती है तो आते ही नहीं हैं और आज जब उसे आराम से आना चाहिए था तो कितनी जल्दी आ गए! अगर थोड़ी देर और होती, तो शायद मेरी बात हो जाती।

खैर, अगले दो स्टेशन के बाद मेरा भी स्टेशन था, अब मेट्रो फिर से जैसे स्लो हो गई थी और सब तरफ से लोगों के फोन की आवाजें आ रही थीं। मैंने महसूस किया कि ये आवाजें मुझे अभी सुनाई दे रही हैं जबकि शायद ये पहले से ही आ रही थीं। उन मैडम के इत्र की खुशबू अभी भी वहां मौजूद थी और मैं उसी में खोया रहा। ऑफिस तो लेट हो ही गया था, अब और जल्दीबाजी करके क्या करता।

ऑफिस पहुंचा तो लोग चौंक कर पूछने लगे, “अरे भाई तुम कैसे लेट हो गए? इतने सालों में तो कभी लेट नहीं हुए पर आज कैसे?”
पर उन्हें क्या पता था कि
‘अब तो शायद रोज ही लेट होने वाली थी।’

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