कल भी कुछ खाने को नसीब नहीं हुआ था, और आज? आज भी दोपहर आधी से ज्यादा बीत चुकी थी, पर कुछ भी नहीं मिला था। और ये दोपहर! ये कोई ऐसी-वैसी दोपहर नहीं थी। जून महीने की लू से भरी हुई दोपहर!
तेज धूप की चमक उसकी आँखों को चौंधिया रही थी। गर्म हवाओं में धूल के कण भी तैर रहे थे, जो धूप को सोख कर उसे और गर्म कर रहे थे। दूर क्षितिज पर गर्म हवा नीचे से ऊपर बह कर ऐसी लग रही थी मानो आँखों के सामने सफेद पारदर्शी पर्दे पड़कर सामने के दृश्य को रोक रहे हों।गर्म-गर्म हवाएं उसके चेहरे पर लग कर उसकी आँखों को गर्म कर छोटा किये जा रही थीं। गर्मी और धूल से भरी हवा उसकी सांसों में मिलकर उसके सीने को अंदर से भी सुखा दे रही थी। गर्म सनसनाती हुई हवा उसके कानों को भेद रही थी और अब उसे हवा की सनसनाहट भी सुनाई नहीं दे रही थी। कई दिनों से भूख के कारण उसका शरीर सूखे हुए बबूल की तरह हो गया था।
थकान, भूख और गर्मी इन सब की परवाह न करते हुए वो कुछ भी मिल जाने की तलाश में थी।
काफी समय ऐसे ही बिताने के बाद उसे दूर एक रोटी पड़ी हुई दिखाई दी, उसे देख उसकी सूखी हुई आँखों में चांदी सी चमक फैल गई। इससे पहले कि कोई और उसे ले लेता, तेजी से वो उसकी तरफ लपकी। उसने उसे उठाने की कोशिश की, पर कमजोर शरीर और रोटी की प्रकृति के कारण पहले प्रयास में वो असफल रही। रोटी की जिस प्रकृति की आप कल्पना कर रहे हैं, उस रूप को वो रोटी काफी पहले ही त्याग चुकी थी—काला रंग, रुखा-सूखा भाग, जिस तवे पर वो बनी थी, अब बिल्कुल वैसा ही आकार-प्रकार लेने लगी थी।
दूसरे प्रयास में वो उस रोटी को अपने कब्जे में लेने में कामयाब हो गई थी। रोटी को पा कर उसके मन में कोई खास खुशी महसूस नहीं हुई थी। एक समय बाद सभी चीजें आपको एक जैसी ही लगती हैं, वो आपको न दुख देती हैं और न ही खुशी, बस जीवन को चलाये जाने का माध्यम बनी रहती हैं। वो जीवन जो क्यों मिला पता नहीं, बस उसे चलाए जाने की कोशिश में सभी लगे रहते हैं, और कब अचानक से ही सारी कोशिशें बंद हो जाती हैं और सब तरफ शांति छा जाती है, किसी को पता भी नहीं चलता है।
उसे बस संतोष इस बात का था कि कम से कम उसके बच्चों को कुछ तो मिलेगा। एक माँ का हृदय होता ही ऐसा है। खुद कितनी भी तकलीफ सह ले पर बच्चों को वो सारी सुविधाएं देना चाहती है जो उसने अपनी कल्पना में सोची रहती है। और अगर किसी कारण से ये सब संभव नहीं हो पाता, तो भी वो उनकी तकलीफों को कम से कम करने का प्रयास तो करती ही है।
उस तवे के आकार-प्रकार की रोटी को वो लेकर चल दी थी। अभी वो कुछ दूर ही चली थी कि किसी ने पीछे से जोरदार हमला किया। हमला इतना जोर का था कि रोटी छटककर उससे दूर जा गिरी और वो भी जमीन पर आ लगी।
ऐसे हमले का क्या ही कारण था, बस वो काली सूखी रोटी ही? और क्या ही था उसके पास जो वो हमला करके उससे ले लेता। रोटी को जमीन पर पड़ा देखकर वो उसकी तरफ बढ़ा। अपने से दोगुने कद-काठी का होने के बावजूद उसने उसकी इस हरकत पर प्रतिक्रिया दी। अगर खुद तक ये बात रहती तो शायद वो उसे देखकर और उसके वार को सह कर चली जाती, पर बात उसके बच्चों के पेट की भी थी। उसने उस हमलावर का प्रतिरोध करना चाहा पर प्रतिद्वंद्वी बहुत ही सबल मालूम हुआ। हमलावर ने रोटी को उठाया और आगे बढ़ गया। उस माँ ने अपनी पूरी जान लगा कर उसका पीछा करना शुरू किया, पर उसकी जान बची ही कितनी थी, जाने कितने ही दिनों से पेट भर कर कुछ खाया भी तो नहीं था। उसके पास बस पीछा करने की ही क्षमता बची थी और शायद इससे ज्यादा वो उसका कुछ कर भी न सकती थी।
सूरज अब क्षितिज के नीचे जाने को हो रहा था। उसकी लालिमा गर्म हवाओं के साथ मिलकर ऐसी लग रही थी जैसे हवा में ज्वालामुखी फूट पड़ा हो और चारों ओर उसका लावा बह निकल हो।
उसे उसका पीछा करते हुए काफी देर हो चुकी थी, एक अंतिम प्रयास करने की उसने सोची और अपनी पूरी ताकत लगा कर उस पर टूट पड़ी, और शायद सही में उसने अपनी पूरी ताकत उसमें झोंक दी थी।
जीवन में सभी जगह ऐसा ही होता आया है, जो कमज़ोर है उसका शोषण होता है, उसके हर कार्य में बाधा और उसकी उपलब्धियों को अपना बनाना चलता ही रहता है। यहां कोई ये नहीं देखता कि उसकी क्या जरूरत है और वो जरूरत कितनी जरूरी है। वो जरूरत किसी के लिए बस सामान्य बात होती है और वहीं दूसरे के लिए वो जीने और मरने का सवाल होती है।
तीनों एक साथ जमीन पर ढेर हो चुके थे, अपनी बची-कुची ताकत को उसने बटोरना शुरू किया और रोटी की तरफ बढ़ी। रोटी की तरफ बढ़ती हुई वो ऐसी लग रही थी जैसे एक चूहा, चूहा मारने वाली दवा खा कर चलता है। वो बस उसके पास पहुंचने ही वाली थी कि उस हमलावर का खतरनाक हमला सीधे उसकी गर्दन पर हुआ और वो वहीं धाराशायी हो गई।
उस हमलावर चील ने उस रोटी के टुकड़े को उठाया और दूर आसमान में उड़ गया
