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एक दो तीन चार

छोटे से गांव में ये शाम भी बाकी शाम जैसी ही थी, शांत और अपनी गति से चलने वाली, गांव के पास में बहती हुई नदी में मानो डूबता हुआ सूरज अपनी सारी लालिमा को नदी के पानी में मिला दे रहा था, ठंडी हवाएं जैसे उस लालिमा के रंग को चुरा कर आसमान को भी उसी के रंग में रंग दे रहीं थी। आसमान और नदी दोनों एक जैसे हो गए थे, जमीन पर नदी आसमान जैसी दिख रही थी और आसमान में एक नदी जैसी बहती हुई प्रतीत हो रही थी। पंछी भी शांति से अपने घर का रुख कर रहे थे, सारा माहौल शांत था बस इसकी शांति को चुनौती देते हुई कुछ दस-बारह साल की बच्चियां एक घर के बाहर लगड़ी-तांग खेल रही थी।


पाती ने गिट्टी फेंकी
“एक दो तीन चार…”  पाती हंसते हुए एक पैर से आगे बढ़ी।
तभी घर के अंदर से मां की आवाज सुनाई दी।


‘पाती! ओ पाती ! आओ घर में शाम होने वाली है। कब तक खेलती रहोगी?’
“आ रही हूं मां, बस मै जीतने ही वाली हूं”  एक पैर से फुदकते हुए ही पाती ने जवाब दिया।
“नहीं बहुत हो गया अब जल्दी से आओ।” मां की वही रुखी आवाज फिर से बाहर आई।


“आ रही हूं !! मां बस दो मिनट और।”  घूमते हुए पाती ने दोनों पैरों को जमीन पर रखा और फिर एक पैर उठा कर आगे बढ़ते हुए मां से बोली।
“अच्छा ठीक है, पर और ज्यादा देर नहीं करना।” मां की आवाज़ आई।
पाती ने फिर से गिट्टी फेंकी।
“एक दो तीन चार… ये !!!! मैं जीत गई, जीत गई।” मारे खुशी के पाती नाच उठी।
“अच्छा तो मै चली, कल मिलते हैं।”  कहते हुए पाती ने अपनी सहेलियों से विदा ली और अपने घर के अंदर चली गई।


अंदर पहुंचते ही पाती सीधे मां के पास जाकर उससे लिपट गई।


मां ने उसे अपने से हटाते हुए कहा “अरे इतनी बड़ी हो गई है, कुछ घर का भी काम धाम सीख ले, शादी होने के बाद जब तू चली जाएगी तो सब कुछ खुद ही करना पड़ेगा।”
“मै कही नहीं जाने वालीं मां!,और मुझे ये खाना वाना बनाना  भी नहीं सीखन है” पाती ने कहा।
“अरे चाय तो बनाना सीख ले कम से कम।” कमरे से मां रसोईघर की तरफ बढ़ी।
“मां! आज मैने सबको हरा दिया लगड़ी टांग में।” पाती जैसे  मां की बात पर ध्यान ही नहीं दे रही थी।
“लंगड़ी टांग छोड़ और मै क्या कह रही हूं वो सुन।”  मां ने थोड़ा नाराज होते हुए कहा।
“क्या है मां?”  पाती ने  भी जैसे अपनी बात न सुनने की झुंझलाहट दिखाई।
“अरे कम से कम चाय तो बनाना सीख ले।”  मां ने फिर से अपनी बात दोहराई।
सीख लूंगी मां! इतनी क्या जल्दी है?पाती ने प्यार से मां को पकड़ते हुए कहा।
“और तुम हमेशा मुझे शादी के लिए क्यों कहती रहती हो? क्या मुझे भी अपने से दूर कर देना चाहती हो? बाबा के जाने के बाद तुम ही तो हो….”
“अच्छा-अच्छा, चल-चल, बाते न बना और थोड़ा हाथ बटा और जल्दी से खा पी कर सोने चल। कल बहुत काम है मुझे।”  कहते हुए मां चूल्हे के पास जाकर बैठ जाती है।
पाती वहीं पास बैठकर गिट्टियों से खेलने लगी थी।
चूल्हे में खाना बनाते हुए मां बस उसे ही निहारती जा रही थी।


“क्या हुआ मां?” पाती ने मां की तरफ देखते हुए कहा।
“कुछ नहीं बेटी” मां फिर से खाना बनाने में लग गई।


   सूरज अब पूरी तरह से नदी में विलीन हो चुका था। अब आसमान पर चांद और सितारों का राज था। ऐसा लगता थक मानो ये सारे तारे टिमटिमा-टिमटिमा कर लोगों को नींद के आगोश में जाने को कह रहें थे, पर पाती की आंखों में नींद कहां थी। बिस्तर पर लेटे हुए भी उसे अपने खेल खेलने की ही बाते सुझाई दे रही थी।


“मां! ओ मां!”  अपनी खपरैल की छत को निहारते हुए पाती ने मां को पुकारा।
मां की नींद अभी हल्की ही थी उन्होंने बस ‘ह्म्म्म’ में जवाब दिया और शायद फिर से सपनो की ओर बढ़ने लगी थी।
“सो गई क्या मां?” पाती ने फिर से पूछा।
“क्या है पाती? सो जाओ कल बहुत सा काम है।”


बच्चों को कल की क्या ही फिक्र, उन्हें तो सब आज-अभी ही दिखाई देता है और जब उनकी खुली आंखों में सपने हों तो आँखें बंद करके सपने वो देखते ही कहां हैं?


“मां ये गिट्टुक(लगड़ी टांग) का खेल क्या टीवी पर नहीं आता कभी?” पाती ने भोला सा सवाल मां से किया।
“नहीं,पर क्यों?” मां ने उबासी लेते हुए पूछा।
“अगर टीवी पर आता तो मैं भी जाती खेलने, मुझे इसमें कोई नहीं हरा सकता है मां!” अंधेरे में भी चमकती हुई आंखों से मां की तरफ देखते हुए पाती ने कहा।
“तू तो हर चीज में तेज़ है मेरी बेटी।” मां ने पाती की पीठ थपथपाई और उसे अपने सीने से लगा लिया।
“अब सो जा कल कुछ मेहमान आने वाले है। बहुत सा काम है।”
मां की ममता भरी गोद से होते हुए पाती नींद की गोद में प्रवेश कर चुकी थी।


   अगला दिन भी उसी तरह का था जैसा वहाँ पर होता था। सब कुछ सामान्य; दिन भी वैसे ही बीता और शाम भी वैसे ही आई। पाती दूसरी लड़कियों के साथ फिर से खेलने लगी।


पाती गिट्टी फेंक रही थी, “एक, दो, तीन, चार।” सभी लड़कियाँ खिलखिलाकर हँस रही थी।
दुनिया के गम अभी उन तक नहीं पहुँच पाए थे। भले ही उन तक शहर की  सभी सुविधाएँ नहीं थी, फिर भी उनके पास एक सुविधा थी, वह थी—संतुष्टि की सुविधा। वे सभी अपने में संतुष्ट थीं, इसलिए खुश भी थीं।


“पाती, ओ पाती!” माँ ने फिर से आवाज़ लगाई।
“हाँ माँ!”
“जल्दी आ बेटा।”
“बस कुछ देर और माँ।”
“नहीं, तुरंत आ, मेहमान आ गए हैं।”
पाती सब कुछ छोड़कर तुरंत घर की ओर दौड़ गई। मेहमान आने पर उसे भी तो अच्छा-अच्छा खाने-पीने को मिल जाता था। घर पहुँचकर वह सीधे माँ के पास रसोई में आई।


“माँ, क्या-क्या है खाने को? मुझे भी दो न।”
“रुक, अभी मेहमान चले जाएँ, जब बच जाएगा तो खा लेना। पहले जा, थोड़ा हाथ-मुँह धोकर तैयार हो जा। मेहमानों के सामने ऐसे ही जाएगी क्या?”


पाती जाकर तैयार होने लगी और माँ रसोईघर में मेहमानों के लिए नाश्ते की तैयारी करने लगी।
“बेटा पाती!”
“हाँ माँ।”
“बेटा, ये नाश्ता ले चल मेहमानों के लिए।”
वैसे तो माँ ही मेहमानों के लिए हमेशा नाश्ता ले जाती थी, पर इस बार पता नहीं क्यों माँ ने उसे कहा था। पाती को लगा कि माँ ने फिर से घर में हाथ बटाने का राग छेड़ दिया था, पर मेहमानों के आने से उसने माँ से कुछ कहा नहीं और चुपचाप नाश्ता लेकर मेहमानों के कमरे में चली गई। माँ भी उसके पीछे-पीछे आ गई थी।
   कमरे में तीन लोग थे—एक अधेड़ उम्र का लड़का और बाकी दोनों शायद उसके माँ-बाप थे। पाती की माँ ने इशारे से नाश्ते को मेहमानों के आगे रखने को कहा और खुद सामने की कुर्सी पर बैठ गई। पाती भी नाश्ता रखकर माँ के बगल में खड़ी हो गई।


“बेटा, सबको नमस्ते करो,” माँ ने मुस्कुराते हुए मेहमानों की तरफ देखकर कहा।
“नमस्ते दादाजी, नमस्ते दादीजी, नमस्ते चाचाजी,” पाती एक साँस में ही सब बोल गई।
माँ ने पाती का हाथ ज़ोर से पकड़कर दबाया। “हूँ… वो चाचा नहीं हैं, पाती।”
“फिर ये भैया कौन हैं, अम्मा?”
“तू अंदर जा!” माँ पाती को धकेलकर कमरे से बाहर कर दिया।
कुछ दिनों बाद,


   शाम आज भी वैसी ही थी, सूरज फिर से नदी की गोद में जाकर उसे नारंगी रंग में रंग रहा था। हवाएँ आज भी उन रंगों को चुराकर आसमान को रंगीन बना रही थीं। आज भी कुछ बच्चियाँ लंगड़ी-टाँग खेल रही थीं, बाकी दिनों की तरह।


एक, दो, तीन, चार… लड़कियाँ हँस रहीं थी और खुशी से बातें कर रही थीं।


सब कुछ पहले जैसा ही है बस पाती को छोड़कर।
पाती साड़ी पहन दुल्हन की तरह लगती हुई, अपने घर की खिड़की से बाहर अपनी सहेलियों को खेलती देख रही थी।

This Post Has 2 Comments

  1. dreamjili2login

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