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टूटी छत

जून की लू के थपेड़ों से भरी हुई दोपहर, सीमेंट की चादर से बनी छत की दरार से आती हुई धूप, मनोज के चेहरे पर पड़ती हुई उसकी नीद में खलल डाल रही थी। बीच-बीच में सफेद बादल आकर उसकी तीव्रता को कम जरूर कर देते थे, पर मनोज को बार-बार अपनी टूटी हुई दाहिनी बाँह से अपने चेहरे को ढकने की असफल कोशिश करनी पड़तीi थी।


       वह बायें हाथ को अपने सर के नीचे रखकर तकिए जैसा बनाकर टूटी बाँह से अपने चेहरे को ढकने की कोशिश कर रहा था। अभी एक हफ्ता ही तो हुआ था बाँह को टूटे हुए, डॉक्टर ने कहा था कि पूरे दो महीने लग जाएंगे सही होने में। एक तो चोट ऊपर से दाहिने हाथ में। अभी तो काम से छुट्टी की है पर कब तक छुट्टी ले सकता है? बिजली का बिल भी जमा करना है, बच्ची की फीस भी जमा करनी है।
     
      उम्र पैतालीस के पार हो चली थी,पर बच्ची अभी छह बरस पहले ही हुई। गरीबो के घरों में लक्ष्मी सिर्फ बेटी के रूप में ही आती हैं, और वो भी शायद उसे और गरीब बनाने के लिए। बेटी लक्ष्मी तभी बन पाती है जब उसे सरस्वती यानी शिक्षा का साथ और दुर्गा यानी सुरक्षा, शक्ति आदि मिलती हैं, जो की किसी अभावग्रस्त के यहां मिलना थोड़ा मुश्किल ही होता है।


        पत्नी भी है, वो भी दूसरो के यहां काम करके घर चलाती है। घर क्या, बस एक कमरा है, सीमेंट की चादर से बनी छत जो कि जगह-जगह से टूटी है। वर्षा काल में पानी, सर्दियों में ओस और गर्मियों में सीधे सूरज देवता घर को नहलाते हैं। ना ही टीवी है, ना ही कूलर या अन्य ऐसी ही कोई बड़ी मशीने जो काम को आसान बनाती हैं। उपकरण के नाम पर बस एक बल्ब और एक पंखा है। चाहता तो वो भी है कि उसकी बेटी और पत्नी उन तथाकथित सुविधाओं का भोग करें, पर आय के स्रोत सीमित हैं।


“ए जी! सुनते हो, कब तक ऐसे पड़े रहोगे? अब तो उठो, देखो मैं क्या लाई हूं,देखो असली है  क्या? मनोज की पत्नी ने कमरे में घुसते हुए सीधे उससे कहा।
“कहाँ से मिले ये तुमको?” मनोज ने अपना टूटा हाथ सर से हटाते हुए कहा।
“रास्ते में,जब काम से लौट रही थी, बरगद के पेड़ के पास पड़ा मिला।”
“अरे असली होता तो कब का कोई ले गया होता, भला हमारी किस्मत में इतना कहां?”
“अरे तुम तो पहले ही मनहूस बाते करने लगते हो, एक बार दिखवा तो लो, मुझे तो असली जैसा लग रहा है।”
“बार-बार एक ही बात मत करो। एक तो पहले से ही हाथ टूटा है ऊपर से सुनार यहीं थोड़े रहता है। हटाओ इसको, मुनिया को दे दो, खेलेगी इससे”
“अरे तुम मेरी बात क्यों नहीं सुनते, छोड़ो, तुमसे तो  बात करना ही बेकार है। मैं ही जा कर दिखाती हूँ।”  कहते हुए वो बाहर निकल जाती है
   पति तो हमेशा ही पत्नियों की नजरों में गया-गुजरा, अव्यावहारिक और बे-नतीजा ही रहता है। यहां अमीरी-गरीबी की कोई बात नहीं है, सभी पत्नियां चाहे अमीर हो या गरीब अपने पति के प्रति समान भावनाएं रखती हैं।


कुछ देर बाद,


“लो! तुम तो कहते थे कि ये नकली है,अरे खरे सोने का बना है। हम तो मालामाल बन गए। अब हमारे गरीबी के दिन गए। अब मुनिया को हम भी अच्छे स्कूल में पढ़ा पाएंगे।” पत्नी ने कमरे में प्रवेश करने के साथ ही कहा।


मनोज पहले तो चौंकता है फिर खुश हो जाता है।
“अब तो मैं काम से ज्यादा छुट्टी भी ले सकता हूं, चाहे दो महीना हो या तीन, अब तो चैन से आराम होगा।”


नहीं नहीं, तुम तो कह रहे थे ये नकली है, जाओ जाओ, मै तुमको नहीं दूंगी। मैं तो सबसे पहले अपने लिए बड़ा वाला फोन खरीदूंगी, मेमसाब के पास जैसा है, वैसा वाला ही।” पत्नी ने इतराते हुए कहा।


“हां, तुमको तो बस फोन और टीवी ही चाहिए, घर-बार तो दिखता नहीं, यहां पति का हाथ टूटा है वो नहीं दिख रहा है।” मनोज ने उसे घूरते हुए कहा।
“क्यों डाक्टर के पास कौन ले कर गया था? सारी दवा-दारू का खर्चा मैने किया, तुमने तो एक ढेला भी नहीं लगाया।” पत्नी ने कहा
“अच्छा! तो मुनिया की फीस कौन भरता है? उसमें और राशन में सब खर्चा हो जाता है, अपने लिए कहा से लाऊं?”
मनोज भड़का।
“अच्छा तो जो हर रात तुम्हारा रसपान चलता है, उसका पैसा  कहाँ से आता है? तब याद नहीं आती है पैसे बचाने की?” पत्नी ने भी आवाज बराबर की
“अब बात को और मत बढ़ाओ। पीता हूं तो अपने पैसे की न, तुमसे मांगने तो नहीं आता। और तुम जो इतना लिपिस्टिक और चूड़ा बिंदी पर खर्चा करती हो उसका क्या? वो क्या बिना पैसे के आते हैं?”
“हैं? अब मेरी चूड़ा बिंदी पर भी तुमको दिक्कत है। रह सह के एक वही बचा है और मैं क्या सिंगार करती हूँ? और तो कोई शौक भी नहीं है। तुम्हारी तरह पैसे तो बर्बाद नहीं करती, कभी पीने में, कभी दोस्तो के साथ। घर का तो खयाल ही नहीं रहता तब तुमको।”
“ज्यादा चपर-चपर मत कर, नहीं तो…”
“नहीं तो क्या, अब तुमसे डरता कौन है?’


बादल के हटने से तेज धूप छत की दरार से एक बार फिर मनोज के चेहरे पड़ती है, मनोज चौंककर उठ जाता है।

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