“देख तो लिया, कै बार कहें?, नही चल रही है, गए ये।” धक्के से दूसरे नंबर का भाई महेश दो कदम आगे जा कर रुक कर बोला।
“सबको खबर देनी होगी।” रमेश ने कहा।
“सब तो हैं, बस छोटकि बाहर गई है। घर में झौवा भर काम पड़ा रहता है ऊ नही दिखता है, बस चकल्लस करने को दे दो।” तीसरे नंबर के भाई सुरेश ने आगे आते हुए कहा।
“अरे ये सब छोड़ो,वसीयत तो देखो कहां छुपा रखी है?, देखें तो ये घर और बाकी चीजें किसके नाम आए हैं, हम भाईयो में से किसकी किस्मत खुली है। महेश ने पास रखी अलमारी में कुछ खोजते हुए कहा।
“ढूंढना क्या है यहीं तखत के नीचे संदूक में रखा होगा।” सबसे छोटे भाई बिपिन ने कहा ।
“ए मनोजवा देख तो..” रमेश ने अपने चौथे भाई मनोज से कहा।
“अच्छे से देखना और कुछ तो नही है।” महेश ने जैसे रमेश की ही बात आगे बढ़ाई।
“और का होगा? अलीबाबा का खजाना छुपा होगा का हियां?” बिपिन बोल उठा।
घनी आबादी वाले इस कस्बे में पांच सगे भाई अपने पिता की मृत्यु पर उनके कमरे में खड़े होकर आपस में बात कर रहे थे रमेश जो केवल उम्र में सबसे बड़ा था पर असल में बड़े होने की कोई भी जिम्मेदारी उसने कभी नहीं निभाई थी। उसके सर से बाल,पीछे के थोड़े छोड़कर, सारे झड़ गए थे और जैसे लगता था बाल झड़ने के साथ साथ उसका दिमाग भी कम होता जा रहा था, वो दूसरों की सुनता कम और अपनी सुनाता ज्यादा था।
महेश और सुरेश दोनो जुड़वां थे पर असल में वो बिल्कुल रमेश पर गए थे, शरीर से लेकर सोच तक, तो तीनो को तिड़वा भाई कहना ज्यादा सही होगा।
चौथे नंबर का भाई मनोज इन सबसे अलग था। थोड़ा समझदार तो था पर उस पर भी अपने से बड़े भाइयों का थोड़ा बहुत असर हो ही गया था। पांचवा भाई बिपिन इन सबमें सबसे तेज था, बस अभी कॉलेज खत्म किया था और कुछ समय बाद उसकी भी शादी होने वाली थी। इन सबमे सबसे छोटी थी छुटकी, उनके पिता की आखरी संतान। उसके बाद इनकी माता चल बसी नहीं तो शायद इनके पिता एक खेल की टीम ही तैयार कर देते। छुटकी की भी शादी नहीं हुई थी। बाक़ी सभी शादी शुदा थे और सभी के दो से लेकर तीन तक बच्चे भी थे।
अभी थोरी देर पहले ही इनके पिता चल बसे थे और ये सभी उनकी वसीयत के पीछे पड़े हुए थे। वैसे तो वसीयत में लिखने के लिए उनके पिता के पास असल में ज्याद कुछ नहीं था पर उनके बेटों को यही लगता है कि उनके पिता ने जरूर कहीं न कहीं उनके लिए संपत्ति छोड़ी होगी। और आखिर ऐसा वो सोचे भी क्यों न? अपने ज़माने के वो काफी मालदार इंसान थे इसी कारण उस कस्बे का सबसे बड़ा पांच कमरों का घर उनके पास था,जिसमें शौचालय भी था, उस कस्बे के अधिकतर घरों में तब तो कोई शौचालय नहीं हुआ करता था। पर कहते है न समय सबसे बड़ा होता है, समय बदलता है और उसके साथ लोगो की किस्मत भी बदल जाती है,धीरे धीरे सब बदल गया और अब उनके पिता के पास इस घर और उनके बच्चों के अलावा कुछ नहीं बचा था। यही उनकी सबसे बड़ी सम्पत्ति थी।
“भैया बस ये एक कागज मिला है।” मनोज ने तख्त के नीचे से संदूक में से एक कागज निकलते हुए कहा।
“ला रे देखूं तो का लिखा है।” रमेश ने कागज मनोज से लेते हुए कहा।
“अरे मेरा चश्मा तो कमरे पर ही रह गया।” रमेश ने आंख पर हाथ फेरते हुए कहा।
“ए बबुआ तू ही पढ़ कर देख न क्या लिखा है। रमेश ने कागज बिपिन की तरफ बढ़ा दिया।
चश्मा तो बस एक बहाना था, असल में रमेश के पढ़ाई लिखाई में हाथ थोड़े तंग थे। बिपिन को जगह थमा रमेश पास ही रखी कुर्सी पर बैठ गया।
बिपिन ने उस कागज को अपने हाथ में लेकर उसे उठाकर आंखों के सामने किया। उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे किसी राजा के सेवक, राजा की कोई सूचना सुनाने जा रहा हो।
बिपिन ने पढ़ना शुरू किया
ॐ नमः शिवाय ॐ
मेरे सभी बच्चो को मेरा प्यार। जब तक तुम ये पढ़ पाओगे मैं इस दुनिया से जा चुका होऊंगा। मैने जीवन में बहुत कुछ कमाया था– पैसा,जस और लगभग सब कुछ, पर मेरी सबसे बड़ी कमाई हो तुम लोग। तुम बच्चे ही मेरा खजाना हो। ये धन दौलत सब बेफिजूल है। प्यार और इज्जत ही सबसे बड़ा धन होता है। पैसा आता है और चला जाता है पर प्यार और इज्जत हमेशा बनी रहती है। बचपन से तुम सब एक साथ रहते आए हो और …..
“ई का लिखा है इसमें, कुछ काम का है भी या नहीं, कि बस कथा कहानी बाची है?” महेश बीच में ही बोल उठा।
“ला दे रे हमका, काम का चीज छोड़ कर बाकी सब पढ़ता है। आखरी में देख ना का लिखा है।”
महेश ने बिपिन से कागज ले लिया था
महेश ने पढ़ना शुरू किया
“…. इसलिए मैं घनश्याम वलद किसना अपनी इस एक मात्र अचल संपत्ति, घर, को अपने सारे बच्चों में बराबर-बराबर बांटता हूं।”
“हैंय? का? फिर से तो पढ़।” रमेश चौक कर कुर्सी से उठ खड़ हुआ।
“….इसलिए मैं घनश्याम वलद किसना अपनी इस एकमात्र अचल संपत्ति घर को अपने सारे बच्चों में बराबर-बराबर बांटता हूं।” महेश ने फिर से वही शब्द पढ़ दिए।
“और कुछ नहीं है का इस घर के अलावा?” सुरेश बोला।
महेश लगभग एक ही सांस में सब कुछ फिर से शुरू से पढ़ता चला गया।
“और तो कछु नहीं लिखा इसमें” महेश बोला।
“ई घर अब कैसे पांच लोगन मा बटी?ऊ भी बराबर-बराबर।” सुरेश बोला।
“पांच नही छह मा, सुना नही लिखा है सब बच्चन मा बराबर-बराबर, मतलब छुटकि का भी हिस्सा है।” बिपिन ने कहा।
“हैंय? छुट्टकि तो लड़की है ,वाका कैसे मिली।” महेश बोला।
“ई सब छोड़ो बाऊ जी के जाने के बाद घर के सबसे बड़े हम ही है, वैसे तो सब हमको ही मिलना चाहिए था पर… वो घर के सबसे आगे का कमरा जहां अभी हम रहते है हमारा, हमारे घुटने बहुत दर्द करते है आगे के कमरे से हमका आसानी होगी।” रमेश ने महेश से कागज लेकर अपनी जेब में रखते हुए कहा।
“भैया हमको तो वही खिड़की वाला कमरा चाहिए। हमारी मेहरारू को खुली हवा चाहिए ही चाहिए इसलिए तो बाउ जी से कहा कर वो कमरा लिए थे।” महेश ने कहा।
“हमको ये बगल वाला कमरा चाहिए, पिछली दीवाली में ही तो हमने इसमें कलर करवाया था।” सुरेश बोला।
“हम तो ओहि रोशनदान वाले कमरे में रहेंगे।” मनोज ने कहा।
“बाऊ जी वाला कमरा हमको चाहिए। हम और छुटकी तो पहले से ही यहीं रहते थे।” बिपिन बोला।
“हम लोगो ने तो अपना-अपना ले लिया, ई छुटकि को का मिली?” मनोज ने पूछा।
“उसको का करना है, बिहाह करके चली जायेगी। यहीं बिपिन के साथ रहेगी बाऊ जी वाले कमरे में, पहले भी तो हिए रहती थी।” रमेश ने कहा।
“नहीं हमारा तो बिहाह होना है, आप सब तो अपनी अपनी मेहरू के साथ रहते है, हम कैसे छुटकी को लेकर रहेंगे और जब सबको एक एक कमरा मिल रहा है तो हमारे में आधा क्यों?” बिपिन तपाक से बोला।
“तो ठीक है उसको आंगन दे दो, वैसे भी उसका बिआह हो जाएगा तो अपने घर चले जाएगी।” रमेश ने कहा।
पर….
मनोज कुछ बोलने ही वाला था कि रमेश की औरत कमरे में आई गई,उसने इशारे से रमेश से पूछा, इशारे से ही रमेश ने बाऊ जी के जाने की बात बता दी। उसकी औरत दहाड़े मार कर रोने लगी। उसका रोना सुन कर बाकी सभी की पत्नियां भी आ पहुंची। रोने धोने का कार्यक्रम शुरू हो गया था। कुछ देर बाद सभी भाई कमरे से बाहर निकल आए।
“पर छुटकि सोएगी कहां?” मनोज ने अपनी बात पूरी की ।
“उसको जो मिला है वहीं रहेगी।” रमेश ने कहा।
“भैया ऊंहा आंगन में तो टाईलेट भी बना हुआ है, ऊंहा ऊ कैसे रहेगी?” मनोज ने कहा।
“अब किया भी का जा सकता है। बाऊ जी की अंतिम इच्छा थी तो कुछ तो देना ही होगा। वरना समाज वाले कहेंगे की बाप की अंतिम इच्छा नहीं पूरी की और बहन का हिस्सा खा गए। हम लोगो में ही अगर बांटा होता तो कोई न कोई अपने पास रख ही लेता।” रमेश बोला।
अब तक उनके पिता की मौत की खबर आस-पड़ौस में फैल चुकी थी। धीरे-धीरे लोग आने लगे थे। क्रियाकर्म की तैयारी शुरू हो चुकी थी, छुटकी भी आ गई थी, उसका रो-रोकर बुरा हाल था पर उसकी भाभियों ने उसे किसी तरह संभल रखा था।
जिसने इस घर को बनवाया था अब उसकी इस घर से हमेशा के लिए विदाई हो रही थी। घर,सामान वही रहते हैं, मालिक बदल जाते हैं, अब इस घर का भी मालिक बदल चुका था।
क्रियाकर्म से निपटकर, शाम में सभी भाई और उनकी पत्नियां रमेश के कमरे में इक्ट्ठा हुए।
“क्रियाकर्म में काफी पैसा खरच हो गया है,आगे और भी खरचा होना है, हमसे ये अकेले नहीं होगा, जब सबको घर में बराबर बराबर हिस्सा मिला है तो इसमें भी सब हाथ बटाओ” रमेश बोला।
पर…. बिपिन कुछ बोलने वाला था,
“पर वर कछु नहीं, बाऊ जी को भी का जरूरत थी ऐसन बटवारा करने की, सबसे बड़े हम थे तो हमाये नाम कर जाते, ऐसा ही तो होता रहा है सब जगह।” रमेश ने बिपिन की बात बीच में ही काटते हुए कहा।
“और हम सब कहां जाते खेते मा” महेश तपाक से बोला।
“बाऊ जी ने ठीक ही किया नहीं तो हम लोग तो सच में गए थे घर के बाहर, छुटकी को तो आंगन दे रहे है,जहां टाइलेट बना है, बाऊ जी न लिखे होते तो का पता हम लोगों का भी वहीं भेजते” बिपिन ने कहा।
“बिचारी छुटकी कैसे रही ऊंहा पर , हम अपने साथ अपने कमरे में रख लें का उसको? मनोज ने कहा।
“देख लो, हमे इसमें कोई दिक्कत नहीं है, आंगन वाला हिस्सा उसका रहेगा, बाकी रहे ऊ किसी के भी साथ।” रमेश ने कहा।
इससे पहले मनोज या और कोई कुछ बोलता मनोज की पत्नी अपना घूँघट बढ़ाते हुए आगे आई और बोली –
“अरे ऐसे कैसे हमाये कमरे में रहेगी? हम और हमाये बच्चे कहां जाएंगे तब? नहीं नहीं हमाये साथ नहीं, किसी और को रखना है तो रख ले अपने साथ।”
सुरेश की पत्नी भी कहां पीछे रहने वाली थी वो भी बोली उठी
“ का बाकी के कमरे सराय खाना है कि कोई भी आ कर रहे उसमें? और जगह ही कित्ती है कमरे में, हमीं लोग को पूरा नाय पड़त है।”
“और का! दो चार मिनट उठना बैठना हो तो ठीक है कोई मना न करी, पर साथ में रहिना न हो पाई, ई बिपिन कहे नहीं रखते अपने कमरे में, पहले भी तो उंहें रहे” महेश की पत्नी बोली।
“नहीं हमने पहले ही कहा दिया था, हमारी शादी होने वाली है, साथ में कैसे रहेंगी वो?” बिपिन बोला
“अरे तो जब तक शादी नहीं हो जाती तब तक तो रह सकती है कि नाही?” मनोज की पत्नी बोली।
“अरे शादी तो होगी ही और ई कोई पुख्ता उपाय तो है नहीं और हमको प्राइबसी भी चाहिए।” बिपिन बोला।
“आह हा बाऊ जी जब थे तब तुमाय ई प्रेबसी कहां गई थी? सुरेश की पत्नी बोली
“तब की बात और थी अब बाऊ जी नहीं है और…” बिपिन बोला
“छोड़ो ये सब, जो पहले तय हो गया उहे रहेगा। छुटकी आंगन में ही रहेगी, वहीं उसकी एक चारपाई डलवा दी जायेगी” रमेश ने कहा
“भैया आराम से बोलो लगता है ई छुटकि गलियारे में ही खड़ी है सुन लेगी तो?” महेश ने कहा।
“अरे सुन लेगी तो सुनने दो, उससे डराइट है का, जो ऊका मिला है वही लेना पड़ेगा।” रमेश ने कहा
पिता के बाद रमेश ही घर का सबसे बड़ा था, सभी पूरी तरह सहमत न होने के बावजूद उसकी बात मान गए थे। इस समस्या का दूसरा भी उपाय निकला जा सकता था जैसे एक और कमरा बनवा कर या ऐसा ही कुछ पर उसे करने में पैसा कौन खर्चा करता? बात खत्म हो चुकी थ, सभी उठकर जाने लगे, छुटकी जो गलियारे में खड़ी थी वो भी वहां से जा कर आंगन में बैठ गई, आज उसके पास सोने के लिए कोई कमरा नहीं था , सभी अपने अपने कमरे में गए और उसे अंदर से बंद कर लिया।
अगली सुबह,
“ए मनोजवा! ई टाईलेट में ताला कौन लगा दिया है? बहुत जोर से आई है। किसके पास है चाभी?” रमेश ने पेट पकड़ते हुए मनोज से पूछा
“हमाये पास नहीं है भइया” मनोज ने जवाब दिया
“जरूर छुटकी ने लगाया होगा, वही तो रात में यहां सोई थी।” बिपिन बोला
“कहां गई है छुटकिया?” रमेश के चेहरे पर बारह बजे हुए थे
“पता नही भइया,फिर कहीं चकल्लस करने निकल गई होगी।” सुरेश ने कहा
“अब का होगा … ढूंढो रे उसको … आह….पेट में दर्द बढ़ता जा रहा है.. कोई तो बुलाओ उसको..”
पूं ..पूं …पूं …….
