शाम का समय दिन अब जाने को है, रात इंतज़ार कर रही है अपनी बारी की। शाम,जो इन दोनों की साथी है, अभी अपनी मौज में है — और अपनी मौज में एक और आदमी भी है,
चला जा रहा है
रास्ते पर,
घर की ओर,
खुशी-खुशी,
कोई चिंता नहीं,
शायद मुक्त
कई कठिनाइयों से,
संतुष्ट
अपने आप से,
शायद इसीलिए है
मस्ती, मौज और संतोष में
चला जा रहा है
अपनी मंज़िल की तरफ।
अरे यह क्या रास्ते में पड़ा हुआ है! — छोटा सा, बड़ा अजीब सा, कुछ हिल भी रहा है। देखूं क्या पास जाकर? नहीं-नहीं, कुछ खतरनाक हुआ तो? एक पत्थर मारकर देखता हूं।
तड़ाक!
निशाना चूक गया। फिर से लगाता हूं —
तड़ाक! लग गया!
“म्याऊं….”
यह क्या? क्या ये बिल्ली थी? यह तो दो हो गई हैं! पास जाकर देखता हूं। इसका तो सिर और धड़ अलग हो गया है! यह क्या कर दिया मैंने?
यह क्या! यह तो फिर से बन रही है — सिर से एक, धड़ से एक! दो-दो बिल्लियां! यह क्या जादू है! एक तो भाग गई, एक को पकड़ लेता हूं।
आसपास से आवाज़ें — “विश कैट! विश कैट!”
हैं? यह क्या बला है — विश कैट?
“क्या तुम्हें नहीं मालूम विश कैट क्या होती है?”
“नहीं!”
“हां, मालूम भी कैसे होगा? तुम तो अपनी ही धुन में लगे रहते हो, देश-दुनिया का हाल क्या जानो तुम।”
“नहीं पता तो सुनो —
बहुत प्राचीन मान्यता है कि ऋग्वैदिक काल के बाद एक ऋषि के पास एक बिल्ली थी। वह ऋषि कोई साधु-महात्मा नहीं था। हर वर्ग में सब समान कहां होते हैं — राक्षसों में भी कुछ साधु हो जाते हैं और कुछ साधुओं में भी राक्षस। तो वह मानसिक रूप से दुष्ट था और राक्षस जैसा ही था। उसने अपनी तपस्या से अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अपनी बिल्ली में मंत्र मारा और उसे इच्छाओं की पूर्ति करने वाली बिल्ली बना दिया, जिसे हम लोग ‘द विश कैट’ कहते हैं। वह उससे कोई भी विश मांग सकता था, और उसका सिर अलग करने से वह दो हो जाती थी — फिर वह उससे दो विश मांग सकता था। वह सारी विश पूरी करती थी, फिर उसे मारो तो वह दो से चार, चार से आठ — ऐसे ही बढ़ती जाती थी। जितनी बड़ी इच्छा, बिल्ली को उतना ही बड़ा करना पड़ता था। विश पूरी हो जाने पर वह साधारण बिल्ली जैसी ही लगती थी।”
“तो हमें लगता है कि यह उसी बिल्ली का भाग है। दूसरी कहां गई?
वह तो भाग गई।
चलो कोई नहीं, एक तो है न — इसी से मांग लो।”
“मैं इन बेकार की बातों को नहीं मानता। मैं तो चला अपने रास्ते।
विश कैट! ऐसा कहीं होता है भला!
विश मांगो और पूरी हो जाए — वो भी बिल्ली से! फिर उसको मारो तो दो, चार, आठ! बकवास!
ऐसा ही है तो मुझे रास्ते में सौ रुपए पड़े हुए मिल जाएं तो मानूं। मैं तो चलता हूं घर।”
आगे रास्ते में सौ रुपए पड़े मिल जाते हैं।
अरे! यह तो सच हो गया!
वो घर जाता है। उस बिल्ली को दो, फिर चार, फिर आठ — ऐसे करते-करते अपनी कई इच्छाएं पूरी करता है — बड़ी नौकरी, गाड़ी, घर, सुंदर शिक्षित पत्नी, सुंदर बच्चे और सभी तरह की इच्छाएं।
कुछ बिल्लियां रहती हैं, कुछ भाग जाती हैं।
शाम का समय, दिन अब जाने को है, रात इंतज़ार कर रही है अपनी बारी की। शाम,जो इन दोनों की साथी है, अभी अपनी मौज में है।
वही एक आदमी रास्ते पर जाता हुआ — सुस्त, चिंतित, असंतुष्ट।
अब उसे घर भी नहीं जाना है।
वह किसी एक खास बिल्ली को ढूंढ रहा है।
उससे उसने कोई बड़ी विश मांगी थी और उसे बड़े समय से बड़ा कर रहा था।
उसके चक्कर में उसने बाकी सारी बिल्लियों को जाने दिया था।
पर अब वो बड़ी बिल्ली भी गायब है।
अब जैसे वो भी खो गया है…
ढूंढ रहा है…
पागल सा…
द विश कैट।
बुद्ध ने भी कहा है कि इच्छाएं ही दुख का कारण हैं — और ऐसा नहीं है कि एक इच्छा पूरी होने पर आप रुक जाते हैं।
एक इच्छा पूरी होने पर आप चाहते हैं कि दो पूरी हों, फिर चार, फिर आठ — और वो बढ़ती ही रहती हैं।
उनकी संख्या तो बढ़ती ही है, उनका आकार भी बढ़ता है।
इन इच्छाओं के कारण लोग अपनी खुशी, संतुष्टि — सब गंवा देते हैं, और इच्छाएं श्राप की तरह उनको परेशान करती रहती हैं।
