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उधार की लिट्टी

उधार की लिट्टी

एक छोटे कस्बे में, शाम ने अपने पैर पसारने शुरू कर दिए थे। गली के मोड़ पर एक छोटी सी लिट्टी-चोखा की दुकान धुएँ और घी की खुशबू से महक रही थी।

दुकानदार (लिट्टी सेंकते हुए)
गरमा-गरम लिट्टी… आओ भइया, खा लो!

तभी एक आदमी लड़खड़ाते हुए आता है… आँखें थोड़ी लाल, चाल थोड़ी टेढ़ी।

आदमी
भइया… चार लिट्टी चोखा लगा दो… extra घी!

दुकानदार (ध्यान से देखते हुए)
पहले ये बताओ… पैसे हैं ना?

आदमी
अरे भइया… हम क्या भाग जाएंगे क्या? पहले खिलाओ तो सही।

दुकानदार (थोड़ा शक में)
ठीक है… लेकिन बाद में बहाना मत बनाना।

आदमी
अरे नहीं भइया… आप खिलाओ।

दुकानदार प्लेट देता है।

आदमी
(खाते हुए) वाह!!! मजा आ गया… एकदम लाजवाब!

एक… दो… तीन… चार… (खाने की आवाजें)

कुछ ही देर में चारों लिट्टी साफ।

दुकानदार
चलो भइया… अब पैसे निकालो।

आदमी
(जेब टटोलता है… फिर दूसरी जेब… फिर पीछे)
अरे… ये क्या…?

दुकानदार
क्या हुआ?

आदमी
भइया… पैसे तो… नहीं हैं!

दुकानदार (गुस्से में)
क्या!? पहले क्यों नहीं बताया?

आदमी
अरे भइया… हमें लगा था होंगे… लेकिन नहीं निकले।

दुकानदार
कोई मोबाइल, घड़ी… कुछ तो होगा?

आदमी
(हँसते हुए) भइया… अगर होता तो क्या छुपाते?

दुकानदार (सोचते हुए)
हम्म… अच्छा… तो अब काम करना पड़ेगा।

आदमी
कैसा काम?

दुकानदार
जब तक पैसे नहीं आते… तुम यहीं दुकान पर काम करो।

आदमी
क्या!? हम?

दुकानदार
हाँ… ग्राहक को लिट्टी देना, प्लेट साफ करना… और “चार लिट्टी का कर्ज” चुकाना।

आदमी (मजबूरी में)
ठीक है भइया…


थोड़ी देर बाद…

आदमी (चिल्लाते हुए)
आओ भइया… गरमा-गरम लिट्टी… एकदम फ्री… नहीं नहीं… पैसे वाली!

दुकानदार
अरे फ्री मत बोलो! और नुकसान कराओगे क्या?

ग्राहक आते हैं…

एक ग्राहक
भइया, चार लिट्टी देना।

आदमी
(आदत से मजबूर)
पहले खा लो… पैसे बाद में देना…

दुकानदार (सिर पकड़ते हुए)
अरे!!! यही तो गलती तुमने खुद की थी!


समय बीतता है…

एक घंटा…
दो घंटा…

आदमी अब थक चुका है… पसीना-पसीना।

आदमी
भइया… बस करा दो… अब तो समझ आ गया “उधार की लिट्टी” कितनी भारी पड़ती है।

तभी उसका एक दोस्त वहाँ आता है।

दोस्त
अरे! तू यहाँ क्या कर रहा है?

आदमी
भाई… चार लिट्टी खा ली… पैसे नहीं थे… अब नौकरी कर रहा हूँ!

दोस्त हँस पड़ता है।

दोस्त
ये लो पैसे… और चलो यहाँ से।

दुकानदार पैसे लेकर मुस्कुराता है।

दुकानदार
चलो भइया… अब फ्री हो गए तुम।

आदमी (हाथ जोड़कर)
भइया… आज के बाद बिना पैसे के कुछ नहीं खाऊंगा।

दुकानदार
और अगर खाओगे…

आदमी
तो फिर नौकरी पक्की! 😄


गली में फिर से हँसी गूंजती है…

और दुकान के बाहर एक नया बोर्ड लग जाता है—

“उधार लेने वालों के लिए—जॉब वैकेंसी उपलब्ध है!” 😄

This Post Has One Comment

  1. Gunja

    Aap apne kahaniyon ke madhyam se jivan ki sacchai darsha rahe hai. Aapki kahaniya aur kathaye kafi manobhavi , manoranjak aur hasyatmak hai.

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