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बारिश (भाग -2) अमन की कलम

लेकिन जैसा कि कॉर्पोरेट में काम करते-करते सीख चुके हैं कि आपदा भी एक अवसर होता है तो सोचा कि जिसकी चाह में मीलों सफर करके जाने का सोच रहे थे जब वो मौसम खुद दर्शन देने दरवाज़े पर आया है तो वाजिब नहीं कि हम उसका इस्तकबाल ना करते। तो हम उठे, सच बोलें तो मन नहीं था उठने का तो सोचे इस अच्छे मौसम में और खिड़की से आती ठंडी-ठंडी बयार के तले कुछ देर और सपने देखे जाएं। लेकिन फिर दिन से भी हमारा वादा था कि बिताएंगे तो कुछ अपने लिए करते हुए और वादा खिलाफ़ी कर दें ऐसी हमारी शख्सियत नहीं। बहरहाल, हम उठे और रोज़ के नित्यकर्मों में जुट गए। कमरे से बाहर आए तो नज़र पड़ी बालकनी से सामने के हरे-भरे मैदान और उस मैदान में बारिश से जूझते वृक्षों पर। मन से आवाज़ आई कि एक तत्काल बैठक होनी चाहिए जिसमें सिर्फ हम, चाय और ये दृश्य कुछ समय बालकनी में हमारी आराम कुर्सी पर विचार-विमर्श करें। तो वैसा ही हुआ, हम गए किचन में अपनी पसंद की इलायची वाली चाय बनाने। फिर अपने कप में चाय और हाथ में अल्बेयर कामू की ‘द फॉल’ लिए अपनी आरामकुर्सी की ओर अग्रसर हुए। अल्बेयर कामू इसलिए क्योंकि कई बार जीवन के बेतुकेपन से भागने के लिए आप जो व्यवस्थाएं करते हैं उनके मध्य होते हुए भी उसी बेतुकेपन को याद करते हैं, अल्बेयर साहब वहां काम आते हैं।खैर, वहीं बैठे-बैठे हमने कुछ देर सामने पड़े दृश्य को निहारा, चाय पी, कुछ देर जीवन के बारे में सोचकर और फिर ना सोचने के लिए उपन्यास पढ़कर हम आरामकुर्सी पर सो गए। जब उठे तो दोपहर होने को आई थी और बारिश भी अब नदारद थी। हां, मौसम अभी भी एक खूबसूरत अंगड़ाई ले रहा था। तभी हमारी नज़र सामने मैदान में खेलते कुछ बच्चों पर पड़ी। शायद बारिश बंद होने की वजह से बाहर आ गए थे और दौड़ लगाते हुए मिट्टी में फिसल-फिसल कर खेल रहे थे। पता नहीं क्यों, पर उन्हें देखते हुए हमें याद आया कि प्लान तो आज का कहीं घूमने जाने का था। इस विचार के आने को हम दार्शनिक कोण नहीं देंगे और वो इसलिए क्योंकि संज्ञानात्मक क्षमता को हर बार एक हसीन मोड़ देना ज़रूरी नहीं। पर अब बात ये थी कि दोपहर हो चुकी है और पानी भराव में गाड़ी निकालना हमें गंवारा नहीं तो तय हुआ कि झोला तो बंधा हुआ रखा ही है, उठा के निकलते हैं बस स्टेशन की ओर ऑटो लेके और जहां जाना है उसका निर्णय बस की उपलब्धता और हमारे उस उपलब्ध बस के गंतव्य को जानने के मन से होगा।आप सोच रहे होंगे कि जिस व्यक्ति को आप पहले भाग में मिले थे ये अलहड़ व्यक्ति वो तो नहीं। और शायद ये सोचना जायज़ भी है लेकिन वहीं ये भी समझना ज़रूरी है कि एकआयामी जीवन समझ खुद एक भूमिका से चिपके उसी को निभाते हुए बीत जाना खुद के अस्तित्व के साथ अन्याय है। मुमकिन है आप उस किरदार की निष्ठा में कुछ ऐसी अनुभूतियों से वंचित रह जाएं जिनको जीवंत करने का सपना कभी गए-गुज़रे देखा हो।तो बस स्टेशन पर बस का इंतज़ार करते हुए हमें आया फोन एक दोस्त का। यह व्यक्ति हमसे जुड़ा तो था व्यावसायिक माध्यम से लेकिन समय के साथ मित्रता काफी घनिष्ठ हो गई। पूछने लगा क्या हाल। हमने कहा बढ़िया बस बस स्टेशन पर बैठे सोच रहे कि कहां जाया जाए। सोचा नहीं था कि वो कॉल ही हमारी दुविधा का निवारण बनेगा। मित्र तपाक से बोला कि बस से उसके शहर पहुंचने में 4 घंटा लगेगा और वहां वो हमें घुमाएगा। सोने पे सुहागा कि सारे बड़े हिल स्टेशन का रास्ता उसी के शहर से जाता है और काफी समय बाद भेंट होगी सो अलग। बस फिर क्या था, मंज़िल पता थी तो अगली बस जो उधर जा रही थी उस पर चढ़ गए।शनिवार होने के कारण हमारे जैसे कुछ और मुसाफिर अपनी गाड़ियों में निकल पड़े थे और सड़क अब भी उतनी ही थी तो भीड़ होना लाज़मी था। खैर गंतव्य पर पहुंचते हुए 11 बज गए थे रात के और भला हो हमारे मित्र का जो हमें लेने आ गया। उसके घर पर पहुंचे तो उसकी मां, गृहणी और नन्ही सी बिटिया से मिले जो अर्ध निद्रा अवस्था में अपने पिताजी के आने का इंतज़ार कर रही थी। हमें याद आया कि ये साहब जो आते ही अपनी बेटी को सहज रूप से गोद में लेकर सुलाने चले गए इन्हें ऑफिस पार्टी में मदिरापान के बाद हम ही इनकी शय्या तक पकड़ के लाते थे। समझ में आया कि काफी कुछ बदलता है समय के साथ और मित्र के सुखी दांपत्य जीवन को देखकर खुशी भी हुई। जीवन दर्पण का एक ये भी पक्ष देखा हमने उस दिन। बहरहाल, हमारा रास्ता तो कुछ और था तो उससे ना डिगते हुए हमने रात का खाना खाया और सो गए। अगले दिन सुबह उठकर घूमने जाने से पहले हमने अपने मैनेजर को फोन करके दो दिन की छुट्टी डाल दी क्योंकि अभी हम जितने भी अलहड़ बन लें पर रोटी अभी भी कॉर्पोरेट मज़दूरी की देन है।घूमने निकले तो हमारे दोस्त का शहर भी किसी आम छोटे शहर की तरह ही था जहां कुछ दुकानें, कुछ मकान, एक बाज़ार और कुछ पुरातन काल की झांकियां जो उस शहर की बची-कुची पहचान की परिचायक थीं। लेकिन एक चीज़ जो हमें याद रहेगी वो है बत्तख का कोरमा। हां, उस दिन के बाद से उस शहर की पहचान हमारे लिए हो गया वो बत्तख का कोरमा। हमने इससे पहले कई जगह बत्तख खाई थी लेकिन इस कोरमे और लच्छे पराठे की टक्कर का कोई नहीं।यही सब घूमते-फिरते और खाते-पीते बज गए थे दोपहर के एक और अब समय था अपनी यात्रा पर अग्रसर होने का। इस शहर से हमारे गंतव्य तक जाने के लिए हमें रास्ते में एक कस्बे में उतरकर दूसरी बस पकड़नी थी तो उसी अनुसार हमने अपने मित्र को बस स्टेशन पर अलविदा बोला और बस चल दी।कस्बे तक का रास्ता काफी आसानी से कटा, कारण था एक टीवी जो बस में लगा था जिस पर विजय की मूवी चल रही थी। इसी बीच हमारी बातचीत हमारे साथ बैठे कुछ मज़दूरों से हुई जो उस कस्बे की ओर फसल काटने के काम से जा रहे थे। बातें जो हुईं वो वही राजनीति और जीवन की कठिनाइयों पर हुईं जिसमें आपको लग सकता है सामाजिक और आर्थिक स्तर भिन्न होने के कारण वार्ता का सामंजस्य बैठाना मुश्किल रहा होगा और एक हद तक संसाधनों की असमानता को झुठलाना भी गलत है। लेकिन मानव संघर्ष जितना भी जटिल हो उसकी सरलता भी यही है कि सामाजिक संरचना के किसी भी स्तर पर उसकी तीव्रता संसाधन अनुसार करीब-करीब उतनी ही है। और हरेक बार काम वहां व्यक्ति का धैर्य और मानसिक बल ही आता है। तो वार्ता रास्ते भर चली और कस्बे पहुंचकर सबने मिलकर पास की टपरी पर चाय पी। उसके बाद वो अपने रास्ते हो लिए और हम अपनी अगली बस के इंतज़ार में स्टेशन पर जाकर बैठ गए।

Aman

दिन के उजाले में एक आम जॉब की ज़िम्मेदारियाँ और शाम ढलते ही शब्दों की जादुई दुनिया—यही अमन की पहचान है। हिंदी और उर्दू शायरी के प्रति उनका जुनून उन्हें रोज कुछ नया लिखने की प्रेरणा देता है। वे अपनी कलम से जिंदगी, मोहब्बत और इंसानी एहसासों को बेहद सादगी से पन्नों पर उतारते हैं।

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