इन ऊंचे ऊंचे फ्लैटों में रहना मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है। ये बिल्डिंगे तो ऊंची ऊंची हैं पर यहां के लोगो के दिलो के बारे में ऐसा कहना संशय भरा है। पर क्योंकि यह शहर का अभिन्न भाग है जहां लोग ज्यादा और स्पेस कम होता है तो फ्लैटों का चलन रहता ही हैं। मुझे भी इस समस्या से दो चार होना ही पड़ता है। यहां आए हुए एक साल से ज्यादा हो चुका है पर यहां जान पहचान शायद ही किसी से हो पाई है। रोज वही चेहरे दिखते है बच्चे, बूढ़े ,जवान, पर किसी से भी एक पल बात नही हुई। ये शहर की जिंदगी ही इतनी तेज है की एक पल रुके नही की एक काम छूटा।
आज सुबह जल्दी हो गई लगता है इतना शोर तो सुबह- सुबह नहीं होता। बाहर निकल कर देखा तो हमारे ऊपर वाले फ्लैट पर लोगो की भीड़ जमा थी। शायद कोई भगवान को प्यारा हो गया था। पड़ोसी होते हुए भी उनसे जान पहचान नहीं थी, पर पड़ोसी का फर्ज तो निभाना ही था सो हम लोग भी स्वेत वस्त्र धारण कर उनके फ्लैट की तरफ चल दिए। वह भीड़ कुछ खास नही थी पर क्योंकि गुजरने वाले का चेहरा ढाका हुआ था तो हमने अंदाजा लगाया की ये जरूर वही बुजुर्ग होंगे जो रोज हमारे घर के सामने से खांसते हुए जाते थे। उनके खांसने से ही हमारी नींद खुलती थी। इनको गया देख अब हम इस वजह से दुखी थे की हमारा अलार्म क्लॉक चला गया । मन ही मन उनको श्रद्धांजलि दे कर हम लोग अपने घर आ गए।
घर आ कर सबसे पहला काम हमने फोन में अलार्म सेट करने का किया, क्योंकि सुबह लेट उठने का मतलब है की पूरा दिन खराब हो जाना। रात में हम इसी डर के साथ सोए की कल सुबह दोपहर को न हो। पर देर से जागने के डर ने नहीं एक अलग ही डर और विस्मय ने हमारी आंखे खोली। वही खांसी की आवाज हमारे कानों में प्रवेश करके हमारे मस्तिष्क और शरीर में सिहरन पैदा कर गई। डर और आश्चर्य से भरे हुए मैंने दरवाजे के होल से बाहर देखा तो लगभग मेरी चीख निकलते -निकलते रह गई। वो वही बुजुर्ग थे जिनके आत्मा- पलायन समारोह में हम कल होकर आए थे, पर वो तो एकदम जीवित लग रहे थे। विस्मय, डर, और विभिन्न प्रकार की भावनाओं के बीच मेरे मन में एक ही बात चल रही थी कि तो फिर “वो कौन था”।
