“हट! हट यहाँ से!”
“ पता नहीं कहाँ-कहाँ से चले आते हैं? खुद तो गंदी हो और मुझे भी गंदी किए जा रही हो। कभी आईने में अपनी शक्ल देखी है? और कभी मेरे जैसी रंगत और चमक देखी है? नहीं ना?”
“वैसे तो मैं यहाँ आती ही नहीं, पर न जाने क्यों आज मुझे यहाँ खींच लाया गया है। और मैं अकेली भी नहीं हूँ—वो देखो! उसे सिर्फ़ मेरा ख्याल रखने के लिए ही लाया गया है अरी! अपनी तरफ़ भी तो देखो। लगता है जैसे कभी साफ पानी छुआ ही नहीं।”
“मुझे देखो—कितने जतन से रखा जाता है मुझे। ज़रा-सा भी गीली हो जाऊँ तो गरम-गरम ब्लोवर से सुखाया जाता है।सुना है कभी ब्लोवर का नाम? नहीं ना।
और ये चमक! ऐसे ही थोड़ी आ गई है। इस पर रोज़ कितनी महँगी-महँगी क्रीम लगती है। सारी चप्पल बिरादरी में लोग मुझे चप्पल सुंदरी कहकर बुलाते हैं।”
“मेरा घर देखोगी तो दंग रह जाओगी—इतना साफ, इतना सुंदर कि चेहरा देखने के लिए शीशे की भी ज़रूरत न पड़े। मेरा बिस्तर तो इतना मुलायम है कि उसमें धँस जाती हूँ।घर पहुँचते ही सीधे अंदर, फिर अपने बिस्तर पर। कहीं आना-जाना नहीं—बस घर से दफ़्तर और दफ़्तर से घर। और दफ़्तर तो ऐसा कि वहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता। उसे भी अंदर आने से पहले पास दिखाना पड़ता है। चप्पे चप्पे पर पुलिस लगी रहती है, एक चीज भी इधर की उधर नहीं हो सकती।”
एक चमकदार चप्पलों का जोड़ा मंदिर के बाहर पड़ी दूसरी चप्पलों पर अपना रोब झाड़ रही थी।
“मैं क्या करूँ बहन!? तुम तो कम से कम एक ही मालिक के साथ रहती हो। पर मैं? मैं तो हर बार नए-नए पैरों में पड़कर तंग आ चुकी हूँ।” थकी-हारी आवाज़ में दूसरी चप्पल ने जवाब दिया।”
“मंदिर के सामने वो जो दुकान दिख रही है, ऐसी ही दुकानें मेरा अंतिम ठिकाना हैं। जिस दिन मंदिर आती हूँ, उसी दिन वहाँ जाना तय है, कोई न कोई मुझे उठाकर वहां औने पौने दाम में बेच देता है, फिर वो दुकानदार मुझे नए मालिक के हवाले कर देता है, ऐसे ही मैं न जाने कितने मालिकों के पैरों तले आ चुकी हूं।”
“और ये मालिक! ये तो मुझे ऐसे-ऐसे मिले कि क्या बताऊँ। एक के घर में तो उसके बच्चे ने मुझे इतनी ज़ोर से काटा कि आज तक निशान पड़ा हुआ है। किसी ने तिलचट्टा मारने तो किसी ने मुझे पेड़ से फल तोड़ने के भी काम लाया, एक मालिक ने तो हद ही कर दी थी उसने तो मुझे किसी के मुंह पर ही दे मारा था, फिर सबूत मिटाने के लिए खुद ही मुझे एक दुकान पर बेच आया। और कितनी कहानियाँ सुनाऊँ बहन तुम्हे?”
“बस-बस! अपनी रामकहानी रहने दो। मैं तो चली। मेरे मालिक आ गए हैं।” चप्पल सुंदरी ने उबासी लेते हुए कहा।
चप्पल सुंदरी वहां से चली गई।
“मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है? काश! मैं भी किसी ऐसे मालिक के पास होती जो मुझे जतन से रखता। पर इसमें मालिक की क्या गलती? मैं हूँ ही ऐसी। अगर मैं भी अच्छे क्वालिटी की बनी होती तो शायद मेरी किस्मत भी बदल जाती।” दूसरी चप्पल ने आह भरते हुए कहा
अचानक से कोई आकर उसे पहनने की कोशिश करने लगता है।
“अरे! अरे! तुम कहाँ आ रहे हो? मैं तुम्हारी नहीं हूँ। हटो मेरे ऊपर से! मेरा मालिक आता ही होगा।
हटो! हटो! ओफ़्फ़ो! कितनी बदबू है। मुझे तो चक्कर आ रहे हैं। आँखों के आगे अँधेरा-सा छा रहा है…”
कुछ समय बाद
“मैं कहाँ हूँ? सिर भारी लग रहा है…” दूसरी चप्पल को होश आता है
“ये क्या! ये तो वही दुकान है।
लगता है मैं फिर से चोरी हो गई हूँ और इसी दुकान पर लौट आई हूँ। मेरी किस्मत ही ऐसी है—जब भी कोई अच्छा मालिक मिलता है, मैं चोरी हो जाती हूँ। और अब देखो, इस गंदी-सी जगह पर एकदम किनारे पटक दिया गया है। ज़रा-सा झटका लगा तो मैं गिर ही जाऊँगी।
तभी कोई आकर अगल बगल की चप्पलों को निकलता है।
अरे-अरे! ध्यान से… ध्यान से भाई कहीं मैं गिर न जाऊं, अरे! अरे! मैं तो गिर ही गई…
दूसरी चप्पल नीचे गिर जाती है, वहां की नीचे वाली रैक पर कई चप्पल लगी होती हैं।
“अरे! चप्पल सुंदरी! तुम यहाँ?” चौंककर दूसरी चप्पल ने कहा।
(ये कहानी एक वास्तविक घटना पर आधारित है जहां एक बहुत ही महंगी चप्पल, एक बहुत ही सुरक्षित माने जाने वाले ऑफिस के योगा रूम के बाहर से गायब हो जाती है)

Bahut sundar
धन्यवाद