गुलाबी सर्दी ने अपनी दस्तक देनी शुरू कर दी थी। लखनऊ की हल्की सर्द भरी शाम तहजीब के साथ अपने चाहने वालों को अपने दीदार के लिए आमंत्रित कर रही थी। मैने भी उसका आमंत्रण स्वीकार कर लिया था और एक हॉफ स्वेटर अपने पर डाल घर से निकल पड़ा था। मुंशीपुलिया मेरे घर से कुछ डेढ़ दो किलोमीटर ही दूर था सो चहलकदमी करते हुए उस तरफ बढ़ गया, घर से निकलते समय तो कुछ खास एजेंडा नहीं था पर आधे रस्ते पहुंचते और साथ ही साथ रास्ते में लगे ढेरों खाने पीने के ठेले देखकर लखन की टिक्की और बताशे खाने का मन हो आया। उसकी दुकान मुंशीपुलिया के पास अरविंदो पार्क से सेंट्रल एकेडमी स्कूल वाली रोड पर स्कूल के करीब ही एक कोने में थी, दुकान काफी समय से अपने स्वाद के लिए प्रसिद्ध थी और मैं भी गाहे बगाहे वहां जाता रहता था। उनके टिक्की और बताशे को याद करके ही मेरे मुंह में पानी आने लगा था। मेरी चाल थोड़ी तेज़ हो चली थी, और वैसे भी सर्दियों में जो कुछ भी खा लीजिए सब पच ही जाता है तो सोचा आज तो जम कर खाऊंगा, इतनी दूर टाहलने का कुछ तो अच्छा परिणाम मिले।
मै चलता जा रह था तभी मेरी नज़र रस्ते के किनारे खड़े एक ठेले पर गई, वो भी टिक्की बताशे की दुकान थी और वहां भी ठीक-ठाक भीड़ लगी थी, ऑफिस से आते समय भी कई बार मैने उसकी दुकान पर भीड़ देखी थी। भीड़ थी तो ये एक प्रमाण था कि यहां भी स्वाद अच्छा हो सकता था। जैसे छोटे बच्चे किसी खिलौने के लिए रोते है और उसे लेने के लिए ढूंढते रहते है पर अगर उन्हें कोई दूसरा खिलौना मिल जाए तो वे उसे भूलकर नए खिलौने में लग जाते हैं, वैसा ही कुछ मेरा भी हाल लग रहा था, मै भी लखन को भूलकर उस दुकान की तरफ मुड़ गया। सोचा,आज यहां का भी स्वाद चख कर देखा जाए।
वहां पहुंचा तो देखा कि दुकान को दो लोग चला रहे थे एक अधेड़ उमर का आदमी था तो दूसरा 20-25 साल का , शायद वो उसका बेटा रहा होगा। अधेड़ उमर का आदमी टिक्कियां बना रहा था और दूसरा आदमी लोगों को बताशे खिला रहा था। पहले मैने टिक्की का ऑर्डर दिया । चूंकि टिक्की बनने में समय था तो मैने उसके बताशे का स्वाद लेने की सोची और बताशे खाने लगा, बताशे वाकई स्वादिष्ट थे और उसके दाम भी कम थे। मन तो और बताशे खाने का था पर मेरी टिक्की तैयार हो गई थी। मैने उससे कहा, भैया अभी और बताशे खाने है, टिक्की खाकर आते हैं फिर से खाने के लिए। ये कह कर मै टिक्की खाने चला, टिक्की का स्वाद चखा, उसकी टिक्की का स्वाद भी अच्छा था पर उसके बताशे के मुकाबले थोड़ा कम था, टिक्की खा कर मै फिर से बताशे की तरफ मुड़ा और उससे कहा – शुरू करो भाई।
बताशे खाते-खाते ही मेरी नज़र एक बहुत ही छोटी बच्ची पर पड़ी। उसकी उम्र शायद 4-5 साल ही रही होगी पर अपनी उम्र से लगभग आधी जैसे 2 साल के मासूम बच्चे होते हैं वैसी लग रही थी। इस सर्द भरे मौसम में जो कि शाम होने के साथ-साथ और बढ़ ही रहा था,वो हॉफ पेंट और हवाई चप्पल पहने हुए खड़ी थी।
अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से वो आस-पास की सभी चीजों का मुआयना कर रही थी। आंखो में लगा काजल उसकी आंखो की सुंदरता को और भी निखार रहा था। उसके छोटे- छोटे हाथो में शायद चाट के दोने से भरा एक प्लास्टिक का बैग भी था जिसे वो बड़े ही सलीके से पकड़े हुई थी, हो सकता है वो बैग उसकी मां या उसके भाई बहनों के लिए हो क्योंकि वो बस वहां अपने पिता के साथ ही आई थी और उसके पिता मेरे ही बगल में खड़े होकर बताशे खा रहे थे।
वो प्लास्टिक का बैग था तो छोटा पर उसके लिए वो भी भारी था। कभी एक हाथ से तो कभी दूसरे हाथ से बदल-बदल वो कर उसे पकड़ रही थी। ऐसा करते-करते जब वो थक गई तो उसने पास की दीवाल के निकले हुए भाग पर बैठने की सोची। उसने पहले उस बैग को उस पर रखा फिर खुद को उस पर बैठाने की कोशिश करने लगी। पहले तो उसने सोचा होगा कि वो वहां तक पहुंच जाएगी पर वो उभार उसकी ऊंचाई से थोड़ा ज्यादा ऊंचा था। लेकिन उसने कोशिश करना जारी रखा और कुछ प्रयासों के बाद वो उस पर बैठने में सफल भी हो गई।
अभी वो उस पर बैठी ही थी कि उसकी मचलती हुई नज़रे सामने पड़े एक लकड़ी के टुकड़े पर पड़ी। अब उसने उसमें जाने क्या देखा कि फौरन वो वहां से उतर पड़ी। अपने पिता द्वारा दी गई चेतावनी के बावजूद उसने उसे उठा लिया। कुछ देर उसका हाल चाल लेकर वो फिर से अपनी जगह जा पहुंची। उसने उस लकड़ी को बैग के बगल में रखा और फिर से दीवाल के उभार पर बैठने की कोशिश करने लगी, पर इस बार उसे पहले से कम प्रयास करने पड़े और वो उस जगह पर जा बैठी। मेरा ध्यान बार बार बताशे खाते हुए उसकी तरफ ही खिंचा चला जा रहा था। कभी-कभी वो मुझे देख मुस्कुरा भी देती थी। उसकी मुस्कान की सुंदरता उसके द्वारा पहने कपड़ो से कही ज्यादा थी। उस मुस्कान में अलग ही किस्म का आकर्षण था और सिर्फ उसकी मुस्कान ही नहीं, उसके पूरे व्यक्तित्व से ही मुझे पता नही क्यों एक अलग ही लगाव का अनुभव हो रहा था। कभी लगता की उसकी किसी प्रकार से मदद करूं पर ये करने के लिए मेरा ही एक मन मुझे रोक देता क्योंकि ऐसा करना उसके पिता के आत्मसम्मान पर ठेस पहुंचाने जैसा होता। ऐसे ही अनगिनत विचारो के साथ कब उसके पिता के बताशे पूरे हो गए पता ही नही चला और वो लड़की अपने पिता के साथ चली गई। बताशे खाकर फिर मैं भी उस लड़की के बारे में सोचते हुए भावो से भरे विचारो में डूबता घर की ओर चल दिया।

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