हुई शाम थी, बैठा एक दिन
सोचा कुछ तो लिख ही दूंगा
मन हि मन में चलने वाली
दिल हि दिल में रहने वाली
कुछ बातो को काग़ज़ पर तो मै रख ही दूंगा
सोचा कुछ तो लिख ही दूंगा
सब द्वेष,घृणा,अपकार,क्रोध
मन के सारे जंजाल सोच
ले कर काग़ज़ उस पर ही मै
रख कलम की ये धार दूंगा
सोचा कुछ तो लिख ही दूंगा
कुछ अच्छी बाते भी हैं मन मे
जो रह यू ही ये जाती हैं
कुछ प्यार,दया ,करुणा का भाव
जो अधरो पर ना आती हैं
ले इनको भी काग़ज़ पर ही
मै प्यार भरी रसधार दूंगा
सोचा कुछ तो लिख ही दूंगा
मन व्यथा यथा रह जाती हैं
बस आंखो से दिख पाती हैं
कुछ डर, शंका, दुःख और विलाप
जो कर्ण अभाव रह जाती हैं
सोचा इनको भी लिख करके ही
काग़ज़ को नम कर ही दूंगा
सोचा कुछ तो लिख ही दूंगा
