पतंगे !
उड़ती फिरती
बहती जाती
जैसे जड़ रहित
चंचल उड़ान,
स्पर्श पवन का और बढ़ाता जिज्ञासा
देखें, छूं लें सारा आसमान।
उड़ती फिरती
बहती जाती
जैसे जड़ रहित
चंचल उड़ान,
स्पर्श पवन का और बढ़ाता जिज्ञासा
देखें, छूं लें सारा आसमान।
पर बंधी कहीं हैं यें भी डोर से
लगता उनको बंधन ये,
काश ये डोरी टूटे तो
मुक्त गगन की हो लें यें ।
लगता उनको बंधन ये,
काश ये डोरी टूटे तो
मुक्त गगन की हो लें यें ।
पर डोर जब टूटी
बहीं जोर से,
स्पर्श पवन का वैसा न था
जैसी मुक्ति की आशा थी
ये अलगाव वैसा न था।
बहीं जोर से,
स्पर्श पवन का वैसा न था
जैसी मुक्ति की आशा थी
ये अलगाव वैसा न था।
आसमान की अभिलाषा थी
पर अब अस्तित्व पर संकट था।
मुक्ति,प्रेम और जिज्ञासा थी
पर अब लगता सब कपट सा था।
पर अब अस्तित्व पर संकट था।
मुक्ति,प्रेम और जिज्ञासा थी
पर अब लगता सब कपट सा था।
टूट अलग हो जाना पतंग ने
डोर व्यर्थ नहीं संपत्ति है,
जिसको कारण बंधन का माना
वो बंधन ही मुक्ति है
वो बंधन ही मुक्ति है।
डोर व्यर्थ नहीं संपत्ति है,
जिसको कारण बंधन का माना
वो बंधन ही मुक्ति है
वो बंधन ही मुक्ति है।
