You are currently viewing मैं मन हूँ।

मैं मन हूँ।

जिंदा नहीं हूँ,

मैं मन हूँ 
कई बार मर चुका हूँ।

ना ही रात में

ना ही अकेले में 

भरी दोपहर,

भरे मेले में

अपना दम घोट चुका हूँ 

जिंदा नहीं हूँ, 

मैं मन हूँ 

कई बार मर चुका हूँ।

किसी की बात पर

कभी हालत पर

कभी वक्त,

कभी जज्बात पर

जिंदा दफन हो चुका हूँ

हां! मैं मन हूँ 

कई बार मर चुका हूँ।

मुस्कुराना, 

चहकना ,

खिलखिलाना,

सपने देखना,

सब कुछ तो भूल चुका हूँ

जिंदा नहीं हूँ,

मैं मन हूँ

कई बार मर चुका हूँ।

मन के हारे हार है

मन के जीते जीत

पर जब जीवन ही नहीं

तब कैसी हार और जीत

इस जीत हार से ऊपर हो चुका हूँ 

जिंदा नहीं हूँ 

मैं मन हूँ 

कई बार मर चुका हूँ।

Leave a Reply