ये जो रात अंधेरी काली है
वो मैंने भी तो काटी है
कुछ रखी है कुछ बाटी है
पर मैंने भी तो काटी है
जब शाम हुई तब से सोचा था
सूरज तो एक दिन देखुंगा
चाहे लाख अंधेरे हो जग में
मै तारो से ही चल लुंगा
पर बादल भी तो आते है
तारे भी गुम हो जाते है
एक लौ जगाई फिर मैंने
एक दिया जलाया था मैंने
पर आती फिर भी पाखी है
ये जो रात अंधेरी काली है
वो मैंने भी तो काटी है
कुछ रखी है कुछ बाटी है
पर मैंने भी तो काटी है
बादल तो छट ही जाते है
पाखी तो घर को जाती है
फिर राह बनाई थी मैंने
एक सोच कमाई थी मैंने
दुनिया ऐसे ही चलती जाती है
ये जो रात अंधेरी काली है
वो मैंने भी तो काटी है
कुछ रखी है कुछ बाटी है
पर मैंने भी तो काटी है
