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फिल्म फेस्टिवल 2



फिल्मों के ही सपने देखते-देखते अगले दिन आंख खुली। उस दिन तो सुबह से ही फिल्म दिखाई जानी थी, पर ऑफिस होने के कारण शाम को ही जा सका।

पहली मूवी जो दिखाई गई थी वह थी “एट लास्ट वी सेड गुड बाय” जो कि लगभग 21 मिनट की थी। कहानी एक मेंटली चैलेंज लड़के, उसके भाई या दोस्त और उसकी केयरटेकर की थी। विचारों और वास्तविकताओं के मध्य विचरण करती हुई कथा कभी-कभी कंफ्यूज भी कर रही थी। पात्र का दो होकर नाम एक ही होना और कन्फ्यूजन बढ़ता था, पर कथा की नाटकीय घटना या कहें विचार इसकी रोचकता को बढ़ाते थे।

दूसरी पिक्चर जो देखी वह 28 मिनट की “प्रोडिगल” थी जो कि एक कन्नड़ मूवी थी। कथावस्तु की बात करें तो वास्तविक जीवन से जुड़ी लग रही थी। कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जो अपने घर से पैसे लेकर भाग जाता है। उसे लूटे जाने पर वापस अपने घर आ जाता है और पता चलता है कि उसके पिता की मृत्यु उसके द्वारा चोरी करने की वजह से हो गई थी। कहानी में उसे लापरवाह और आदतन चोर दिखाया गया है। अपने दोस्तों के बहकावे में आकर वह अपने भाई द्वारा सौदे की गई जमीन के 10 लाख रुपए चुराकर बस से भागने जाता है, पर अपनी लापरवाही की वजह से पुनः पैसों को खो देता है।

तीसरी शॉर्ट फिल्म थी “टेल्स ऑफ़ ययाति” जो लगभग 10 मिनट की थी। फिल्म का कथानक बहुत ही जिज्ञासा जगाने वाला था। ययाति की कहानी के विचार को बहुत ही रोचक ढंग से दिखाया गया है। एक व्यक्ति को अपने ही भविष्य के रूप से छह प्रश्न पूछने को मिलते हैं, पर उसमें शर्त यह होती है कि उन छह प्रश्नों के बाद अगले प्रत्येक प्रश्न पूछने की कीमत उसकी उम्र से घटा दी जाएगी। ऊपरी तौर से देखने पर कहानी का उद्देश्य समझ में नहीं आता, पर अगर गौर से देखा जाए तो पता चलता है कि कैसे आदमी अपने जीवन के सवालों में भटक कर उसमें खो जाता है और अपने जीवन को ही समाप्त कर लेता है। वह प्रश्नों में ही उलझा रहता है और कब जीवन समाप्ति की ओर आ जाता है, पता ही नहीं चलता है। हां, जीवन से प्रश्न पूछे जाने चाहिए, पर एक सीमा भी जरूरी है—यही कहानी की मुख्य थीम थी।

इसके बाद रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित प्रसिद्ध मूवी “शोले” की प्रदर्शनी की गई। इस मूवी के गोल्डन जुबली के अवसर पर इसकी प्रदर्शनी की जा रही थी। पर चूंकि शोले फिल्म देख चुका था, इसलिए बस कुछ देर इसका बड़े पर्दे पर आनंद लेकर घर की ओर निकल पड़ा।

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