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फिल्म फेस्टिवल 1

पिछले रविवार की सुबह साइकिल पर सैर करते हुए मन हुआ कि आज किसी नए रास्ते का रुख किया जाए, तो चलाते-चलाते साइकिल दूसरी तरफ मोड़ ली। रास्ता अनजान था, पर शहर तो अपना ही था और ये तो कहा ही जाता है कि दुनिया गोल है, घूम-फिर कर वहीं आया ही जा सकता है और अक्सर अनजान रास्ते ही आपको सही जगह पंहुचा देते हैं। चलते-चलते साइकिल एक रेलवे क्रॉसिंग के पास पहुँची। ट्रेन आने वाली थी, फाटक बंद था, इसलिए रुकना पड़ा।

   इधर-उधर नज़र दौड़ाते हुए अचानक मेरी नज़र क्रॉसिंग के उस पार लगे एक बोर्ड पर पड़ी, जिस पर एक फिल्म फेस्टिवल का प्रचार था। यह फिल्म फेस्टिवल आगामी हफ़्ते के तीन दिनों में होना था। फिल्मों में रुचि होने के कारण यह सूचना दिमाग में बैठाकर फाटक खुलने पर मैं अपने मार्ग-खोज अभियान पर निकल पड़ा।

   घर पहुँचकर फिल्म फेस्टिवल की डिटेल इंटरनेट पर सर्च करने लगा। पता चला कि यह फेस्टिवल कई शहरों में होता हुआ हमारे शहर लखनऊ में आया है और काफ़ी प्रसिद्ध भी है। यह भी पता चला कि इसकी टिकट ऑनलाइन बहुत कम कीमत पर उपलब्ध है। मैंने तुरंत ही तीनों दिनों की टिकट बुक कर ली।

   धीरे-धीरे हफ़्ते के दिन बीते और अंततः वह दिन आ गया जिसका इंतज़ार था। फेस्टिवल दोपहर से शुरू होना था, पर ऑफिस होने के कारण समय पर पहुँचना मुश्किल था। जल्दी-जल्दी काम निपटाकर मैं किसी तरह शाम 5 बजे के बाद वहाँ पहुँचा सका।

   जब मैं वहां पहुंचा तो कुछ-एक ओपनिंग प्रोग्राम निकल चुके थे पर उस दिन की मुख्य स्क्रीनिंग उसी दिन रिलीज़ हुई फिल्म थी जोकि एक प्रख्यात अभिनेता द्वारा अभिनीत थी। उसे दिखाया जाना बाकी था,। मै हाल के अंदर दाखिल हुआ,हाल पूरा भरा हुआ था, यहाँ तक कि लोग ज़मीन पर बैठकर भी मूवी देखने को तैयार थे। पर मैं केवल भीड़ में शामिल होने नहीं, बल्कि फिल्म का आनंद भी लेने गया था, इसलिए मैंने अंदर न जाने का निर्णय लिया। वैसे भी वो नई फिल्म थी तो अभी कई दिन थिएटर में रहने वाली थी। उस मुख्य फिल्म के बाद कई डॉक्यूमेंट्री और शॉर्ट फिल्में दिखाई जानी थीं, जिनके लिए मैं विशेष रूप से उत्साहित था। मेरे पास लगभग दो-ढाई घंटे खाली थे। वहीं पास की दूसरी स्क्रीन पर कुछ लोग अंदर जा रहे थे तो मैं बस जिज्ञासावश ये देखने के लिए अंदर गया कि कौन-सी फिल्म चल रही है? मूवी शुरू ही होने वाली थी तो मैं भी अंदर जाकर एक खाली सीट पर बैठ गया। धीरे-धीरे लोग आ रहे थे, जिनकी सीट पर मैं बैठा था वो लोग भी आने लगे तो खिसक-खिसक कर दूसरी, तीसरी फिर चौथी सीट पर गया। एक ने तो पूछ ही लिया कि आपकी सीट कौन-सी है? मैंने कहा—भैया, मेरी कोई सीट नहीं है और मुस्कुरा कर अगले सीट पर बैठ गया।
   फिल्म का आनंद लेकर बाहर निकला तो देखा कि फेस्टिवल की मुख्य स्क्रीन पर शॉर्ट फिल्मों का सेशन शुरू होने वाला था। अब हाल पूरी तरह खाली था, बस 10-15 लोग बचे थे। मैं एक अच्छी सीट पर जाकर बैठ गया और इंतज़ार करने लगा।

   पहली शॉर्ट फिल्म जो दिखाई गई वो थी “मेहता एंड कंपनी” जिसके लेखक और निर्देशक मिस्टर रोहित सेन थे। पहले पहल देखा जाए तो लगता है कि इसकी कहानी भाषाई तनाव पर बेस्ड है, पर गहराई से देखने पर पता चलता है कि मुख्य विषय भाषाई तनाव का नहीं बल्कि आत्मीय लगाव का है। एक बेटा जो अपने पिता की मृत्यु के बाद उनकी सभी चीजों से कनेक्ट होता है, पिता के द्वारा बनाए  दुकान के पुराने बोर्ड को भी नहीं चेंज कर पाता है, जो की भाषाई तनाव की वजह बनता है। निर्देशक ने बहुत ही बखूबी से प्रतीकों और बिम्बो का प्रयोग किया है, जो की बहुत ही कम संवादों से बहुत कुछ कह जाते हैं।
  दूसरी फिल्म जिसका शीर्षक “नानी” था और जिसके संवाद स्पेनिश, बंगाली और अंग्रेज़ी में थे। यह फिल्म एक बुज़ुर्ग और पेरलाइज़्ड नानी, जो लगभग पिछले 3 सालों से घर से बाहर नहीं निकली है, की बीच (समुद्र तट) पर जाने की अधूरी इच्छा पर आधारित थी। ईद के मौके पर उसकी नातिन उससे मिलने आती है और नानी बार-बार उसे देख कर “बिच” कहती रहती है। सभी को लगता है कि वह “बिच” (अपशब्द) कह रही है, पर अंत में पता चलता है कि वह वास्तव में समुद्र किनारे यानी “बीच” की बात कर रही थी। फिर उसकी नातिन अपने पिता की सहमति के बिना चुपचाप उसे बीच पर ले जाती है जहां नानी की बहुत ही संतुष्ट मुस्कान के साथ फिल्म समाप्त होती है।

   तीसरी शॉर्ट फिल्म एक तुर्की फिल्म थी जिसका नाम था “रूटलेस”, जिसमें एक लड़की और फिर एक लड़का अपनी खोई हुई शैडो की बातचीत और उसे ढूंढा जाए या ना ढूंढा जैसे विचार करते हैं। यह फिल्म प्रतीकात्मक और थोड़ी कठिन मालूम होती थी।

   अंतिम फिल्म, जो लगभग डेढ़ घंटे की थी, का नाम था “पापा की पिक्चर”। शुरुआत में हॉल के बाहर इंतज़ार करते हुए उसके निर्देशक पृथ्वी दास गुप्ता और फिल्म के बाकी कलाकारों से भेंट हो चुकी थी। निर्देशक से पता चला था कि यह पिता पर आधारित एक पारिवारिक फिल्म है। फिल्म शुरू हुई तो निर्देशक और कलाकार मेरे पीछे ही आकर बैठ गए। उम्मीद थी कि फिल्म कुछ अलग होगी, पर कथानक मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं निकला। बार-बार उबासियाँ लेते हुए मैं घड़ी देखने लगा। सोचा था कि फिल्म ख़त्म होने पर कलाकारों से बातचीत करूंगा, लेकिन बोरियत और समय अधिक हो जाने से यह इच्छा समाप्त हो गई थी।

   घर से भी कई बार फोन आ चुका था, पर चूँकि “मेहता एंड कंपनी” फिल्म बहुत अच्छी लगी थी अतः उसके निर्देशक से मिलते हुए और उन्हें बधाई देते हुए निकला। लगभग 11:30 बजे घर पहुँचा। आमतौर पर मैं 10 बजे तक सो जाता हूँ, पर आज आँखों में नींद नहीं थी, बस फिल्मों के दृश्य ही स्मृति पटल से होते हुए नेत्र पटल तक विचरण कर रहे थे।

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