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पहले का आनंद

“पहला” शब्द कितना मनमोहक होता है, जिसके आगे लगता है उसके महत्व को बढ़ा देता है, अब चाहे वह पहला काम हो, कार हो, घर हो या कुछ और।
यहां बात है लोकसभा इलेक्शन में मेरी पहली ड्यूटी की।
बैंक में काम करने के साथ चुनाव में ड्यूटी! ज्वॉइन करते समय तो ये नहीं सोचा था,पर सोचा हुआ कहां होता ही है, पहले तो सिर्फ शहरों के बैंक देखे थे, साफ-सुथरे,पंखे,एसी,और न जाने क्या-क्या, पर जब ज्वाइन किया तो पिछड़े इलाके के गांव में पोस्टिंग मिली जहां न सही कनेक्टिविटी थी,न एसी या कूलर और न ही बाकी इच्छित और कल्पित सुविधाएं।
खैर, छोड़िए, तो मैं आपको बता रहा था मेरी इलेक्शन में ड्यूटी के बारे में। मैं तो खुश था क्योंकि एक तो अलग तरह का अनुभव, दूसरा ये भी सुना था कि वोटिंग डे के अगले दिन छुट्टी भी मिलती है और ड्यूटी का मेहनताना मिलता है सो अलग। मुझे बताया गया कि चूंकि मेरा काम नगदी विभाग से संबंधित था तो मेरी ड्यूटी नहीं लगनी चाहिए। पर मैने तो भगवान से प्रार्थना शुरू कर दी कि मेरी भी ड्यूटी लग जाए। वैसे मेरी प्रार्थना जल्दी नहीं सुनी जाती है पर,चमत्कार! मेरा नाम भी इलेक्शन ड्यूटी के कर्मचारियों की लिस्ट में था। मुझे लगा, वाह! लगता है भगवान के साथ मेरी ट्यूनिंग जम गई है।
साथी कर्मियों ने तो अलग तरह का ही माहौल बना रखा था, किसी ने ट्रक में भैंसों की तरह भर कर आने, तो किसी ने पंचायत चुनाव में अपने भयंकर अनुभव साझा किए। सुनने में तो मजा आया पर अपने आप को उस स्थिति में कल्पना करके भय भी लगा। अतः खुशी और डर दोनों भावनाएं साथ थी।
पहली ट्रेनिंग मेरी शाखा से लगभग 70 किलोमीटर दूर स्थित एक कॉलेज में रखी गई, तो अपनी बाइक उठा कर नजरों का लुफ्त उठते हुए मैं वहां पहुंचा। वह जा कर देखता हूं कि यहां तो जैसे कोई मेला लगा हुआ है, लोग ही लोग। किसी कॉम्पटीटिव एग्जाम के पेपर में जैसे लोग अपने अपने रोल नंबर देख कर अपने अपने रूम में जाते हैं वैसे ही मैं भी अपना नंबर देख अपने ट्रेनिंग रूम की तरफ बढ़ गया। उत्साह और डर की वजह से ट्रेनिंग में बताई गई मशीनों की गुणा भाग अच्छे से सीखी। कुछ लोग मेरे जैसे नए थे तो कुछ लोग कई बार ट्रेनिंग कर चुके थे इसीलिए काफी इत्मीनान से बैठे लग रहे थे।
दूसरी ट्रेनिंग में मेरी टीम के बाकी सदस्यों से भी मुलाकात हुई। सभी ने एक दूसरे का नंबर नोट किया और वोटिंग के एक दिन पहले मिलने का वादा करके अपने अपने घर लौट गए।
दो ट्रेनिंग के बाद अंततः वो दिन आ ही गया जब हम लोगों को वोटिंग से एक दिन पहले मिलना था। वह जगह ट्रेनिंग से भी भव्य और विशाल थी। एक चादर,एक जोड़ी कपड़े, फोन,पावर बैंक, कुछ खाने पीने का सामान आदि लेकर मै वहां पहुंचा था। सभी लोग मिले और फिर सामग्री वितरण समारोह शुरू हुआ। मशीन हमे दी गई, उन सबका उनके सीरियल से मिलान करके हम लोग उसे रखते जा रहे थे।मशीनें मिलने पर ऐसा लग रहा था जैसे हमारी सेना को अस्त्र शास्त्र  प्रदान किए जा रहे है। बैंक में होने के नाते सभी ने मशीनों की तकनीकी को संभालने का काम मुझे ही सौंपा। फिर हम लोगों को किसी वाहन कि तरफ भेजा गया, ये देख कर संतोष हुआ कि ये कोई ट्रक नहीं था बल्कि एक बस थी। हम लोग तो बस में जल्दी आ गए थे पर एक पार्टी अभी तक नही आई थी, पार्टी शब्द को पढ़कर आप ये न समझिएगा की यहां कोई पार्टी-शार्टी वाली बात चल रही है, बल्कि ये शब्द एक चुनाव बूथ के सभी सदस्यों से मिल कर बनी एक टीम का नाम होता है। एक बस में अमूमन चार से पांच पार्टियां होती है। शुरुआत हो चुकी थी। हम भैंस तो नहीं बने थे पर गर्मी ने हमारा भूसा जरूर बना दिया था। काफी देर इंतेज़ार करने के बाद जब सभी लोग आ गए तब हमारी बस चल दी। हमें लगा था कि हम लोग थोड़ी देर में पहुंच जाएंगे पर बस तो चलती ही जा रही थी। मुख्य सड़क से गौड़ सड़क, फिर खड़ंजे से कच्ची सड़क होते हुए बस एक खेत के पास जाकर रुकी। हम लोग बस से उतर कर पगडंडी से होते हुए एक प्राथमिक विद्यालय पहुंचे जो कि लगभग चारों तरफ से खेतों से घिरा हुआ था। न कोई दुकान न कोई मकान, चारों ओर सन्नाटा। प्राकृतिक नजारे तो बहुत अच्छे लग रहे थे पर कही कोई व्यवस्था नहीं दिख रही थी। कुछ देर बाद उस गांव के प्रधान ने आकर बैठने और खाने की व्यवस्था कराई, उस विद्यालय की रसोई में हमारे लिए भोजन बनाया गया। पर ऐसा लगता था जैसे वहां के पानी को तो जैसे पीलिया हो गया है। जिद्दी इतना कि दो-चार बार उबालने के बाद भी अपना रंग नहीं बदल रहा था। वहां न तो पंखे या लाइट की कोई व्यवस्था थी और न ही सोने की। किसी तरह से रात काटी गई। अगले दिन सुबह चार बजे ही उठकर नित्यक्रिया निपटा कर हम लोगों ने मॉक पोल की प्रक्रिया शुरू की। सुबह सात बजे से वोटिंग शुरू होनी थी। सुबह सुबह ही सेक्टर मजिस्ट्रेट ने आ कर हम लोगों को हमारे कार्य के मेहनताने की कड़कड़ाती धनराशि भी दे दी। धीरे- धीरे लोग आने लगे, दोपहर से थोड़ी भीड़ लगनी शुरू हुई पर शाम होते-होते सब सामान्य हो गया, जो कुछ भी वोटिंग के संदर्भ में सुना था ऐसा कुछ नहीं हुआ। उस गांव के लोग बहुत ही सीधे थे, बस छोटी मोटी समस्या आई जैसे किसी के नाम में सरनेम किसी और का है, किसी को वोटर कार्ड में मेल की जगह फीमेल बना दिया गया था इत्यादि। बाकी सब सामान्य तरीके से हुआ। शाम छह बजे वोटिंग समाप्त हुई और हम लोग अपनी मशीनें सील करने में लग गए। करते-करते एक घंटे से ज्यादा बीत गए अब अंधेरा भी होने  लगा था और फिर हमारी बस भी आ गई तो हम लोगों को जैसा जो था वैसा लेकर बस में बैठाना पड़ा। मैने मशीन का कंट्रोल पैनल पकड़ रखा था जिसमें सारे वोट्स रिकॉर्ड होते हैं। उसे हाथ में लिए मुझे ऐसा अनुभव हो रहा था जैसे मैं ‘न्यूटन मूवी’ का ‘न्यूटन कुमार’ हूं। अभी तक सब ठीक था पर हम लोग अभी तक तो सिर्फ समुद्र किनारे हीं पहुंचे थे। अभी तो समुद्र पार करके रावण का वध करना और फिर वापस उसे पार करके आना बाकी ही था, यानी मशीन को सुरक्षित जमा करना तो बचा ही था।
तीन घंटे बस में सफर करके हम लोग मशीन जमा केंद्र जा पहुंचे। अब तो काफी अंधेरा हो गया था और उस जगह भयंकर भीड़ भी थी। लगभग सभी लोग जहां जगह मिल रही थी वहीं बैठ कर अपने- अपने कागज पूरे करने में लगे थे। हमने भी चादरें बिछाई और अपने कागज पूरे करने में लग गए। अव्यवस्था और भीड़ के कारण मशीन जमा करते-करते रात के एक बज गए। रावण वध सम्पन्न हुआ अब समुद्र पार करके घर भी आना था। राम जी को तो पुष्पक विमान मिल गया था पर मुझे तो लौह पथ गामिनी से ही सफर करना था। साधन उपलब्ध न होने से पैदल ही रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ गया। वह पहुंचकर ट्रेन का इंतेज़ार करने लगा जो लगभग एक घंटे बाद आने वाली थी।जब ट्रेन आई तो उसमें भीड़ देखकर अपने सहकर्मी की बात याद आ गई कि कैसे वो भैंसों की तरह लद कर गए थे। खैर,जाना तो था ही, तो किसी तरह अंदर घुस गया। अन्दर बैठने की कोई जगह नही थी। अब समझ में आ रहा था कि भगवान ने मेरी इतनी जल्दी कैसे सुन ली थी। थकान के कारण मेरी खड़े होने की भी हिम्मत नही थी तो ट्रेन की जमीन को ही गुलगुला बिस्तर जानकार लेट गया। लेटते ही कब नींद आ गई पता ही नहीं चला और सीधे सुबह ही आंखे खुली।
अनुभव कैसा भी हो, अच्छा या बुरा कुछ न कुछ सिखा ही जाता है। अब तो ऐसे कई चुनाव देख चुका हूं। कहते भी है न पहली बार डर लगता है, दूसरी बार आसान लगता है और तीसरी बार आदत बन जाती है।” पहला हुआ तभी तीसरी में आदत बन पाई,अतः डरिए नहीं पहले का आनंद लीजिए।

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