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शब्द

शुरुआत का समय, सोचा लिखना चाहिए, विचार तो बहुत मन में आते है पर क्या-क्या पता नहीं । बड़े अजीबो- गरीब, स्वप्न भी कहानी या चलचित्र के समान प्रतीत होते। आनंद तो बड़ा आता है पर क्या ये सभी लिखने योग्य है? विचार चलता रहता । अब तो मन बना ही लिया है, वैसे कविताएं और छोटी- मोटी कहानियां पहले भी लिख चुका हूं पर भावनाओ और विचारों को विस्तार देने का मौका नहीं मिला। उसी सोच के तहत इसकी शुरुआत कर रहा हूं।
विषय तो संसार में असीम है , कुछ मैने भी समय-समय पर नोट करके रखे है कि कभी समय मिल तो उन पर विचारों के घोड़े दौड़ाए जाए पर शुरुआत के लिए एक विषय का चुनाव करना ही था। किस विषय पर शब्दों से विस्तार किया जाए समझ में नहीं आता था, सोचा क्यों न “शब्द” को ही अपना विषय बनकर शुभारंभ किया जाए।
“शब्द”पर विचार करें तो ढाई अक्षर का है ये, वैसे ढाई अक्षर के लिए किसी और ने अपना पेटेंट करा रखा है पर है तो ये भी ढाई अक्षर का ही। “श” से शुरू हो कर “द” पर अंत। श से शोर का अर्थ भी लिया जा सकता है और शांति का भी। द से दंगा भी अर्थ लगाया जा सकता है और दमन भी। शब्द इन सबके मध्य विचरण करता है। शोर में तो कई शब्द सुनने को मिलते है- अच्छे, बुरे, हास्य-व्यंग्य, सौम्य,कटु आदि आदि। उसे समझना उतना मुश्किल नहीं, पर शांति के शब्द एक टेढ़ी खीर है। शांत रहते हुए जो शब्दों  के बाण चलते हैं वो बाण खाने वाला ही जनता है। नयनों के मौन शब्द तो प्रख्यात हैं ही। एक प्रसिद्ध कवि बिहारी ने कहा भी है-

   “कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।
            भरे भौन मैं करत हैं, नैननु ही सब बात”॥

प्रेम का इज़हार करना हो या क्रोध का, सुनाई देने वाले शब्दों की अपेक्षा मौन शब्द कहीं अधिक कारगर हैं। पर प्रामाणिकता की बात की जाए तो सुनाई देने वाले शब्द ज्यादा प्रामाणिक हैं और उसमें भी ज्यादा लिखे हुए शब्द। पर जो सुकून मौन शब्द में हैं वो और कहा मिल सकता है। प्रकृति का मौन शब्द हमें कितना प्यार लगता है। पेड़ पौधे, जानवर , नदियां पहाड़ सभी बिना कुछ कहे भी हमसे कुछ न कुछ कहते हैं।कोई किसी एक शब्द के सहारे अपना जीवन गुजर देता है उसी को रटते रटते जीवन पार हो जाता है, तो कोई शब्द न कहने की शर्त पर  व्रत धरकर मोक्ष पाना चाहता है। सभी के लिए शब्दों के अपने अपने मायने हैं।
इसमें क्या क्या लिखा पता नहीं, विचार कई है पर अभी शुरुआत है, आगे और प्रवीणता आए। इसी बात के साथ मनघड़ंत के इस भाग में इतना ही। पुनः मिलते है किसी अन्य रोचक विचार के साथ।

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