ऐ चन्द्र तुम्हारी किरणों में
सब कुछ निर्मल सा लगता है
सब कहते है कि अंधकार है
पर मुझको तो सब ही दिखता है।
रूप रंग का भेद मिटा कर
तुम सबको सम कर देते हो
दिन भर की जितनी पीड़ा हो
सबको तुम हर लेते हो।
रात अंधेरी जितनी हो
उतने ही उज्जवल लगते हो
बाहर से शांत भले ही हो
अंदर से चंचल लगते हो।
जाने कितने ही जन्मों से यू
सहज अटल ही लगते हो
कुछ तो बाते होंगी मन में
ये बाते किससे करते हो।
एकांतवास में बैठे हो
क्या स्नेह किसी से करते हो
गर करते भी हो तो क्या है
क्यों व्यर्थ किसी से डरते हो
जीवन के सत्य को भी
बस यूं ही तुम कह देते हो
कुछ घटता है कुछ बड़ता है
पर जीवन तो यू ही चलता है
ऐ चन्द्र तुम्हारी किरणों में
सब कुछ निर्मल सा लगता है
सब कहते है कि अंधकार है
पर मुझको तो सब ही दिखता है।
