कान उमेठकर तेजी से मैं उसे लिये चला जा रहा था कि तभी उस लाल पारी की लालिमा ने मुझे रुकने पर मजबूर कर दिया और भी लोग जहां थे वहीं ठिठक गए। उसकी लालिमा है ही ऐसी — पर वो आकर्षक नहीं, भय के कारण होती है।
“हाँ हाँ, जाओ, मुझे पार करके, मुझे उपेक्षित छोड़कर — अभी मैसेज आ जाएगा चालान का!”
एंबुलेंस, नेता, बड़े अफसर — सभी की लाल बत्ती से ज़्यादा चमक है मेरी, और जब से मुझे कैमरा मिल गया है, तब से तो मेरी रंगत पूरी निखर आई है।
सभी उसकी लालिमा से भय खाकर रुक चुके थे। तभी आगे कुछ बहस की आवाज़ सुनाई दी। कान हटाकर आँखें उस ओर मोड़ दीं। बहस का विषय क्या था, कुछ समझ में नहीं आ रहा था, पर बार-बार एक आदमी अपने पैरों में पड़े जूते की तरफ देखे जा रहा था और फिर गुस्से से दूसरे आदमी को देखकर कुछ कह रहा था। शब्द न सही, फिर भी संकेत से कुछ अंदाज़ा लगाया जा सकता था। मामला समझ में आ गया था — दूसरे बाइक सवार ने पहले बाइक सवार के जूते पर अपना जूता रख दिया था।
रख क्या दिया था, कोई घर से सोचकर तो चला नहीं था कि आज किसी के जूते पर जूता रखूँगा! ट्रैफिक सिग्नल हुआ, कई गाड़ियाँ रुकीं, अगल-बगल, गलती से जूता जूते पर आ गया। और यह तो उसकी किस्मत ही कहेंगे कि जूता ऐसा-वैसा नहीं था — बहुत महंगा रहा होगा, नहीं तो कोई इस बात के लिए बहस क्यों करता?
कई जूते तो होते भी महंगे हैं — कईयों के तो घर भी चले जाते हैं उसे खरीदने में। इतना महंगा जूता लेने में क्या ही समझदारी! आखिर उसका काम तो पैर की रक्षा करना ही है — पैर गंदा न हो, चोट न लगे, थोड़ा आरामदायक हो — यही तो काम है उसका। पर अब तो जूते भी “स्टेटस सिंबल” बन गए हैं। जितना महंगा जूता, स्टेटस उतना ऊँचा। बहरहाल, जूता चाहे जितना महंगा हो, उसकी बाइक तो स्प्लेंडर प्लस ही थी।
दूसरे आदमी की हालत कैसी भी हो रही हो, मुझे लगता है जूते को तो बहुत ही आनंद आया होगा, क्योंकि जैसी खुशी मुझे शाहरुख़ ख़ान से गले मिलने पर होती, वैसे ही उसे भी हो रही होगी। और तो और, गले मिलना तो छोड़िए — अगर मैं शाहरुख़ ख़ान पर गलती से गिर भी गया होता तो अपने सभी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर स्टेटस लगा दिया होता कि “टुडे आई मेट विद द किंग ऑफ बॉलीवुड — द शाहरुख़ ख़ान।”
खैर, उसके मालिक की तो सर पर पैर रखकर — माफ कीजिएगा — सर पर जूता रखकर भागने की नौबत आने वाली थी। पर उधर लाल पारी की लालिमा अस्त हुई, और हरे-हरे मनमोहक तीरों ने सभी को अपना-अपना काम और अपना-अपना रास्ता नापने के लिए कह दिया। पंचायत छोड़, मैंने भी अपनी बाइक का कान उमेठा और आगे बढ़ गया।
