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फिल्म फेस्टिवल 3

अगला दिन क्योंकि रविवार था तो मैं सुबह से ही फिल्म फेस्टिवल में था। सुबह 9:00 बजे से स्क्रीनिंग की शुरुआत होनी थी पर मैं 8:45 पर ही वहां पहुंच चुका था। पहुंचने पर देखा कि कई स्कूल के बच्चे भी वहां आ रहे हैं। अंदाजा लगाया कि शायद सुबह का शो बच्चों के लिए है।

मेरा अंदाजा सही निकला। पहली मूवी बच्चों के लिए ही थी जिसका शीर्षक था “फ्रेंड बुक”। 40 मिनट की इस फिल्म में एक बोलने वाली किताब एक बच्चे को उसका लक्ष्य निर्धारित करने और उसे पूरा करने में मदद करती है। बीच-बीच में कई प्रेरक और उत्साहवर्धक विचार उसमें चार चांद लगा देते हैं। मेरे विचार से सभी बच्चों को यह मूवी देखनी चाहिए।

दूसरी फिल्म भी बच्चों के लिए थी। 19 मिनट की इस फिल्म का नाम था “करामाती पौधा”। बाल मन की कोमल भावनाओं और उनके अबोध विचारों से भरी कहानी खूब हंसाती भी है और पौधारोपण का संदेश भी देती है। तीन दोस्तों की इस कहानी में रोचक मोड़ तब आता है जब बाकी दो दोस्तों को उनका तीसरा दोस्त बताता है कि कैसे एक पौधे के उसके घर आने पर उसके परिवार के अमीरी के दिन शुरू हो गए हैं। फिर शुरू होती है कहानी उस पौधे को चुराने की। पहला दोस्त उसके घर से उस पौधे को चुराता है तो उसके भी अच्छे दिन शुरू हो जाते हैं। फिर पैसों के खर्चों को लेकर दोनों दोस्तों में मतभेद हो जाता है। तब दूसरा दोस्त तीसरे को बता देता है कि पौधा कहां है और वो उसे आकर ले जाता है और फिर उसके गरीबी के दिन शुरू हो जाते हैं। तभी उसके पिता अपने ऑफिस से एक पौधा लेकर आते हैं और बताते हैं कि ये पौधा उनके लिए बहुत लकी है। बच्चा उसे देखकर खुश हो जाता है। यहीं कहानी समाप्त होती है।

उसके बाद 1 मिनट की मूवी “ब्लाइंडफोल्ड” का प्रदर्शन हुआ जिसकी थीम थी कि कैसे तकनीक ने हमारी आंखों पर पट्टी बांध रखी है। हम हर चीज के लिए अब एआई जैसी तकनीकों पर निर्भर होते जा रहे हैं। इसने हमारी सोचने और समझने की क्षमता सीमित कर दी है। हमारे आगे खुला आसमान है पर हम लोग काल्पनिक दुनिया को असली मान कर उसी को सबकुछ समझ बैठते हैं। यही संदेश यह मूवी बच्चों को देती है।

बच्चों की फिल्में समाप्त होती हैं और एक-एक करके सभी बच्चे हॉल से बाहर चले जाते हैं। उन बच्चों के साथ बैठकर मूवी देखकर ऐसा लगा जैसे बचपन वापस आ गया हो। खैर, बच्चे जा चुके थे और हॉल में अब बस कुछ ही लोग बचे थे।

उसके बाद एक डॉक्यूमेंट्री प्रकार की फिल्म का प्रदर्शन किया गया। जिसका टाइटल था “वन साइड ऑफ द रोड – वूमेन वॉयसेस”। जो कि तमिल में थी। इसमें दक्षिण प्रदेश में महिलाओं और खासकर दलित-गरीब महिलाओं की दिनचर्या को दर्शाया गया है। विजया और लक्ष्मी जैसे वास्तविक पात्रों के माध्यम से दिखाया गया कि किस प्रकार इन महिलाओं को सामाजिक पूर्वाग्रहों को झेलना पड़ता है और अपने आजीविका को कमाने और अपने बच्चों को पालने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। ना ही उनके पास कोई सार्वजनिक सुरक्षा की पहुंच है, न ही वित्तीय और शैक्षिक सुविधाओं की उपलब्धता।

उसके बाद एक बहुत ही बेहतरीन मूवी का प्रदर्शन हुआ जिसका नाम था पीडीसी। पीडीसी यानी “पिग इज़ ए डैंजरस क्रिएचर”। जो कि एक मलयाली फिल्म थी। कहानी का मुख्य विषय-वस्तु मानव-पशु संघर्ष पर आधारित था। इस विषय को बहुत ही बेहतरीन ढंग से निर्देशक राफ़ी मथिरा ने दर्शाया है। एक व्यक्ति जिसको  वाइल्ड पिग की हत्या और उसके मांस खाने के जुर्म में  जेल में डाला जाता है( वाइल्ड पिग को वह संरक्षित पशु का दर्ज मिला दिखाया गया है), अंत में वो बेगुनाह साबित होता है। कहानी हास्य-व्यंग्य से शुरू होती है और विभिन्न ट्विस्ट और टर्न के साथ अंततः मानव-पशु संघर्ष के अपने मुख्य प्रश्न पर छोड़ जाती है।

इसके बाद एक बॉलीवुड मूवी “छावा” की प्रदर्शनी की गई, जो कि देखी हुई थी। लगातार बैठना और भूख भी एक कारण था उसको न देखने का। भोजन करने और कुछ देर टहलने के बाद अगले शो के लिए प्रवेश किया जिसमें हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता ताहिर राज भसीन के साथ वार्तालाप, उनके विचारों को सुनने और उनसे प्रश्न पूछने का अवसर मिला। उनसे मिलने के लिए विभिन्न कलाकार और नए-पुराने निर्देशक भी आए हुए थे। उनसे मिलकर यह ज्ञात हुआ कि शिक्षा का महत्व हर जगह है। किसी भी फील्ड के अनुभव के साथ-साथ उसकी शिक्षा आपको नए आयाम, नई सोच और ऊंचाई प्रदान करती है। ताहिर हर प्रश्न का बहुत ही धैर्य, सादगी और बुद्धिमत्ता से जवाब दे रहे थे। उन्होंने भावी कलाकारों के लिए एकाग्रता, निरीक्षण और कल्पनाशीलता – इन तीन गुणों के महत्व को समझाया और साथ ही आज की युवा पीढ़ी के लिए सोशल मीडिया और रील्स आदि के हानिकारक प्रभाव भी बताए।

उनके कार्यक्रम के समाप्ति के बाद कुछ और निर्देशकों और कलाकारों से मुलाकात करने का अवसर मिला। फिल्मों, मुलाकातों और बातचीत के इस जादुई माहौल को अपने दिलोदिमाग में संजोता हुआ, जागती आंखों में सपने और कुछ ख्वाहिशें लेकर मैं घर की ओर निकल पड़ा।

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