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चाट की दुकान

एक शाम चाट की दुकान पर बताशे खाते हुए एक बहुत ही छोटी बच्ची दिखी शायद उसकी उम्र 4-5 साल रही होगी पर अपनी उम्र से लगभग आधी 2 साल की मासूम सी बच्ची लग रही थी। इस ठंड भरे मौसम में भी हाफ पैंट में थी वो, और बहुत पुरानी सी हवाई चप्पल भी पहन रखी थी। आंखो का काजल उसकी आंखो की सुंदरता को और भी निखार रहे थे। उसके छोटे छोटे हाथो में चाट के दोने से भरा एक प्लास्टिक का बैग भी था जिसे वो बड़े ही सलीके से पकड़े हुई थी शायद वो बैग उसकी मां या उसके भाई बहन के लिए होगा क्योंकि उसके पिता मेरे बगल में खड़े होकर बताशे खा रहे थे। शायद वो बहुत ही थकी हुई थी इसलिए साइड पर बनी हुई दीवार के उभार पर बार बार बैठने की कोशिश कर रही थी और कुछ प्रयासों के बाद वो सफल भी हो जाती है।तभी उसे लकड़ी का एक टुकड़ा दिखाई देता है और वो उसे लेने के लिए फिर से उतर पड़ती है। अपने पिता द्वारा दी गई चेतावनी के बावजूद वो लकड़ी उठा लेती है और पुनः अपनी जगह पर बैठ जाती है।मैं बार बार बताशे खाते हुए उसे ही देख रहा था। कभी वो मुझे देख मुस्कुरा भी देती थी। उसकी मुस्कान की सुंदरता उसके द्वारा पहने कपड़ो से कही ज्यादा थी। उससे पता नही क्यों एक अलग सा ही लगाव का भाव आ रहा था मुझमें। कभी लगता की उसकी कुछ पैसों से मदद करू पर ये करने के लिए मेरा ही एक मन मुझे रोक देता क्योंकि ऐसा करना उसके पिता के आत्मसम्मान पर ठेस पहुंचाने जैसा होता। ऐसे ही अनगिनत विचारो के साथ कब बताशे पूरे हो गए पता ही नही चला और वो लड़की अपने पिता के साथ चली गई। फिर मैं भी उस लड़की के बारे में सोचते हुए भावो से भरे विचारो में डूबता घर की ओर चल दिया।

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